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BS-6 नहीं तो एंट्री नहीं! NCR से हटा दिए जाएंगे 2 लाख पुराने ट्रक; प्रदूषण पर लगाम का मेगा एक्शन प्लान

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संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। दिल्ली समेत एनसीआर में वाहनों से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए केंद्र सरकार एक बड़ी योजना बना रही है। योजना के तहत तीन चरणों वाली एक रणनीति तैयार की जा रही है। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पंजीकृत ऐसे लगभग दो लाख ट्रकों को धीरे-धीरे हटाना है, जो बीएस छह के उत्सर्जन नियमों का पालन नहीं करते।

साथ ही, अगले पांच सालों में सरकारी और निजी, दोनों तरह की करीब 20,000 डीजल बसों को सीएनजी में बदला जाएगा। सूत्रों के मुताबिक केंद्र सरकार दिल्ली समेत एनसीआर में ट्रक मालिकों को वित्तीय सहायता और ब्याज पर सब्सिडी देने जैसे कई विकल्पों पर विचार कर रही है, ताकि वे अपने पुराने वाहनों को बीएस छह मानकों वाले ट्रकों से बदल सकें।

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बताया जाता है कि एनसीआर में पंजीकृत करीब 20,000 डीजल बसों को सीएनजी वाहनों में बदलने की योजना पर लगभग 2,500 करोड़ रुपये का खर्च आ सकता है। योजना की रूपरेखा जल्द ही तैयार की जा सकती है। इस सारी कवायद से यह सुनिश्चित होगा कि एनसीआर में चलने वाली सभी वाहन साफ ईंधन पर चलें।

एक आधिकारिक सूत्र ने बताया, \“चूंकि बसों और ट्रकों के मालिकों से जुड़ी इस योजना को लागू करने में समय लग सकता है, इसीलिए इसके क्रियान्वयन के लिए पांच साल का समय रखा गया है। एक बार जब यह योजना सिरे चढ़ जाएगी तो और भी कड़े नियम लागू करना संभव होगा।

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\“इसी क्रम में तीसरा चरण यह होगा कि जो ट्रक और डीजल बसें बीएस छह नियमों का पालन नहीं करतीं और एनसीआर की सीमा में घुसती हैं, उन सब पर पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क लगाया जाएगा।


माना जा रहा है कि इन प्रयासों से वाहनों से होने वाले प्रदूषण में कमी आएगी। साथ ही, इलेक्ट्रिक कारों, बसों और ट्रकों के बढ़ते इस्तेमाल से भी इस लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली समेत एनसीआर में लगभग 3.3 करोड़ पंजीकृत वाहन हैं। इनमें से तकरीबन 2.2 करोड़ के पास वैध पंजीकरण और फिटनेस सर्टिफिकेट हैं।

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कुछ माह पूर्व एक संसदीय समिति को दी गई प्रस्तुति में, सरकार ने बताया था कि दिल्ली समेत एनसीआर में लगभग सात लाख मध्यम और भारी कमर्शियल वाहन पंजीकृत हैं। इनमें से तीन लाख से कुछ ज्यादा के पास वैध पंजीकरण और फिटनेस सर्टिफिकेट हैं। मालूम हो कि वाहन प्रदूषण का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा मध्यम और भारी कमर्शियल वाहनों की वजह से ही होता है।

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