उत्तराखंड पहाड़ की 1737 बस्तियों में हर व्यक्ति को नसीब नहीं 55 लीटर स्वच्छ जल, पेयजल संकट बढ़ा
https://www.jagranimages.com/images/2026/01/10/article/image/water_-1768017979990.jpgपहाड़ों पर पेयजल को लेकर कई सालों में बनी लगातार कमजोर योजना व निगरानी से पेयजल संकट बढ़ा। सांकेतिक तस्वीर
राज्य ब्यूरो, जागरण, देहरादून। पहाड़ों की धरती में कभी हर गांव के पास गधेरा, नौला और धारा जीवन का आधार हुआ करते थे। अब पहाड़ पर पानी ही सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। यह संकट अचानक ही पैदा नहीं हुआ बल्कि वर्षों की अनदेखी का नतीजा है।
हालत यह है कि राज्य की 1737 बस्तियां ऐसी हैं, जहां हर व्यक्ति को रोजाना न्यूनतम मानक का 55 लीटर स्वच्छ पानी भी नसीब नहीं हो पा रहा है। उत्तराखंड में पेयजल आपूर्ति को लेकर पूर्व में जारी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट बताती है कि पहाड़ों पर पेयजल को लेकर पिछले कई सालों में लगातार कमजोर योजना व निगरानी की कमी से पेयजल संकट बढ़ा है।
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में स्वच्छ पेयजल का संकट अब किसी एक गांव या मौसम तक सीमित नहीं रह गया है। यह संकट हर साल गहरा जाता है। अल्मोड़ा के स्याल्दे, पौड़ी के द्वारीखाल, जैहरीखाल, चौबट्टाखाल, टिहरी के घनसाली और चैम्बा ब्लाक तथा पिथौरागढ़ के बेरीनाग जैसे इलाकों में हालत यह है कि घरों तक पानी की पाइपलाइन तो पहुंची है, लेकिन उनमें नियमित पानी नहीं आता। कई गांवों में पानी सप्ताह में एक-दो बार ही मिल पाता है, जबकि गर्मियों में सप्लाई पूरी तरह प्रभावित हो जाती है।
पारंपरिक जल स्रोत सूखे तो हुई समस्या
पारंपरिक जल स्रोतों का सूखना इस संकट की सबसे बड़ी वजह है। जिन स्रोतों पर पीढ़ियों से गांव निर्भर थे, वे अब या तो बरसात के बाद थोड़े समय के लिए सक्रिय रहते हैं या पूरी तरह खत्म हो चुके हैं।
टिहरी के हेयात देवता स्रोत से जुड़े गांवों और जौनसार क्षेत्र के नगरथात, गंगोआ, चितर, विशोई और जंडोह जैसे गांवों में ग्रामीणों को एक से तीन किलोमीटर नीचे उतरकर पानी लाना पड़ता है। सरकारी योजनाओं के तहत नलों के कनेक्शन तो दे दिए गए लेकिन पाइपलाइन लीकेज और रख-रखाव की कमी के कारण पानी घरों तक नहीं पहुंच रहा है।
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पानी की गुणवत्ता भी चिंता का विषय
पौड़ी जिले के सिंदुरी जैसे गांवों में पानी की समस्या पलायन की भी बड़ी वजह है। ग्रामीणों के अनुसार पानी के लिए टैंकर या दूरस्थ जलस्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है। संकट केवल पानी का नहीं है, उसकी गुणवत्ता भी चिंता का विषय है। अल्मोड़ा और बागेश्वर के कुछ गांवों में दूषित पानी चुनौती बना हुआ है।
पर्यटन ने पहाड़ी गांवों की परेशानी और बढ़ा दी है। चकराता, औली, चोपता और कौसानी जैसे इलाकों में पर्यटकों की बढ़ती संख्या से पानी की मांग कई गुना बढ़ जाती है, जबकि स्थानीय आबादी के लिए पहले से ही पानी सीमित रहता है।
उत्तराखंड में एडीबी परियोजनाओं के तहत कई शहरों के पेयजल लाइन विस्तार का काम किया जा रहा है। आने वाले दो-तीन वर्षों में पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था को नए आयाम मिलेंगे।
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-विनय मिश्रा, अपर कार्यक्रम निदेशक, उत्तराखंड शहरी क्षेत्र विकास एजेंसी।
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