केंद्र के फैसले से बिहार को बड़ा झटका! आबादी के आधार पर मेडिकल कॉलेजों की उम्मीद टूटी, दक्षिणी राज्यों को मिला सीधा फायदा
https://www.jagranimages.com/images/2026/01/10/article/image/medical-1768018045574.jpgआबादी के आधार पर मेडिकल कॉलेजों की उम्मीद टूटी
जागरण संवाददाता, पटना। केंद्र सरकार के एक हालिया निर्णय ने बिहार को बड़ा झटका दिया है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) द्वारा मेडिकल कॉलेजों की स्थापना में आबादी के आधार पर तय किए गए मानक को फिलहाल लागू नहीं करने के फैसले से उत्तर भारत के राज्यों, खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश को नुकसान हुआ है। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब देश के चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिनमें से तीन तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी दक्षिण भारत से हैं। ऐसे में इस निर्णय को राजनीतिक नजरिए से भी देखा जा रहा है।
दरअसल, एनएमसी ने पहले यह प्रावधान किया था कि नए मेडिकल कॉलेजों की मंजूरी आबादी के अनुपात में दी जाएगी। इसके तहत 10 हजार की आबादी पर एक एमबीबीएस सीट का मानक तय किया गया था।
यदि यह नियम लागू होता तो बिहार जैसे घनी आबादी वाले राज्य को इसका सबसे ज्यादा लाभ मिलता। बिहार की आबादी करीब 13 करोड़ है, जबकि यहां मेडिकल सीटों की संख्या लगभग 3000 के आसपास है।
यानी बिहार में करीब 43 हजार की आबादी पर एक एमबीबीएस सीट उपलब्ध है, जो बेहद चिंताजनक स्थिति है।
तुलनात्मक रूप से देखें तो उत्तर प्रदेश की आबादी लगभग 24 करोड़ है और वहां करीब 13,500 मेडिकल सीटें हैं। वहीं दक्षिण भारत के राज्यों में स्थिति बिल्कुल अलग है।
केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और पुदुचेरी जैसे राज्यों में आबादी के अनुपात में पहले से ही मेडिकल कॉलेज और सीटों की संख्या काफी ज्यादा है।
दक्षिण के इन राज्यों की कुल आबादी करीब 27 करोड़ है और यहां लगभग 50 हजार एमबीबीएस सीटें उपलब्ध हैं।
अब केंद्र सरकार द्वारा एनएमसी के आबादी आधारित फॉर्मूले को सत्र 2026-27 के लिए लागू नहीं करने और नए मेडिकल कॉलेजों के लिए फिर से आवेदन मंगाने के फैसले से वही राज्य लाभ में रहेंगे, जहां पहले से मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत है।
इसका सीधा नुकसान बिहार जैसे राज्यों को होगा, जहां डॉक्टरों और मेडिकल कॉलेजों की भारी कमी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आबादी आधारित फॉर्मूला लागू होता तो बिहार में दर्जनों नए मेडिकल कॉलेज खुलने का रास्ता साफ हो सकता था।
इससे न सिर्फ डॉक्टरों की कमी दूर होती, बल्कि स्थानीय छात्रों को भी राज्य में ही पढ़ाई का मौका मिलता। लेकिन केंद्र के इस फैसले से बिहार की उम्मीदों पर पानी फिर गया है।
राजनीतिक गलियारों में इसे चुनावी साइड इफेक्ट के तौर पर देखा जा रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इस फैसले से फायदा किसे हुआ?
जवाब साफ है, दक्षिण के वही राज्य, जहां पहले से आबादी के अनुपात में मेडिकल कॉलेजों की भरमार है। बिहार के लिए यह फैसला स्वास्थ्य शिक्षा के मोर्चे पर एक बड़ा झटका माना जा रहा है, जिसका असर आने वाले वर्षों तक देखने को मिल सकता है।
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