सिर्फ 2 फिल्मों से इस डायरेक्टर ने बॉलीवुड में रचा था इतिहास, पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने भी देखी थी इनकी फिल्म
https://www.jagranimages.com/images/2026/01/11/article/image/pakeezah-1768139633548.pngइस डायरेक्टर ने सिर्फ 2 फिल्मों से रचा था इतिहास
अनंत विजय, नई दिल्ली। कमाल अमरोही का नाम लेते ही फिल्म ‘महल’, ‘पाकीजा’, ‘दायरा’ और ‘रजिया सुल्तान’ का नाम याद आता है। कमाल अमरोही ने बहुत कम फिल्में निर्देशित कीं, लेकिन सबमें उन्होंने अपनी कला की अमिट छाप छोड़ी। वैसे तो वो 1938 से ही फिल्म जगत में कहानीकार और डायलॉग राइटर के रूप में उपस्थित थे, लेकिन उनको निर्देशक के रूप में पहचान मिली बांबे टाकीज की फिल्म ‘महल’ से।
जब \“धर्म संकट\“ में फंसे थे अशोक कुमार
आजादी के ठीक पहले देविका रानी ने 1946 में रशियन पेंटर रोरिक से शादी कर ली और बांबे टाकीज में उनकी रुचि कम हो गई। उन्होंने अभिनेता अशोक कुमार और सावक वाचा को 28 लाख रुपये में बांबे टाकीज बेच दिया। अशोक कुमार ने जब बांबे टाकीज संभाला तो उस समय स्वाधीनता आंदोलन चरम पर पहुंच चुका था। पूरे देश में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच तनाव की स्थिति थी। बांबे टाकीज में काम करने वाले हिंदू और मुस्लिम कर्मचारियों के बीच तनाव महसूस किया जा रहा था। उस दौर में
अशोक कुमार और सावक वाचा ने बांबे टाकीज से कई हिंदू कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाकर मुस्लिम कर्मचारियों को काम पर रख लिया था।
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अशोक कुमार ने अमरोही पर किया भरोसा
वहां तनाव बढ़ रहा था। उनके लिए काम करने वाले लेखक सअदात हसन मंटो ने अशोक कुमार को चेताया था कि वो ऐसा ना करें क्योंकि इससे हिंदू बहुत नाराज हो जाएंगे। अशोक कुमार कहते थे कि वो ना तो हिंदू हैं और ना ही मुसलमान बल्कि वो तो कलाकार हैं। कला ही उनका धर्म है। इस सोच के चलते ही अशोक कुमार ने बांबे टाकीज की अपनी पहली फिल्म ‘महल’ को निर्देशित करने के लिए एक मुस्लिम निर्देशक कमाल अमरोही को साइन किया था। नोआखाली में हिंदुओं के नरसंहार के बाद देशभर में हिंदू-मुसलमान के बीच की दरार गहरी हो गई थी। ऐसे माहौल में अशोक कुमार ने मुस्लिम निर्देशक को फिल्म सौंपने का निर्णय लिया था, जिसकी बहुत आलोचना हुई थी, लेकिन अशोक कुमार अपने निर्णय पर अडिग रहे।
कमाल अमरोही ने ही फिल्म ‘महल’ निर्देशित की, जो 1949 में प्रदर्शित हुई। इस फिल्म ने इतिहास रच दिया था। इसके बाद 1953 में कमाल अमरोही ने ‘दायरा’ फिल्म निर्देशित की। ये फिल्म फ्लाप रही थी और कमाल अमरोही एक बेहतर कहानी और फिल्म की तलाश में थे। उनको ‘पाकीजा’ की कहानी में ये संभावना दिखी और उसको निर्देशित करने का काम शुरू किया।
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इस फिल्म ने बदली डायरेक्टर की किस्मत
फिल्म ‘पाकीजा’ ने कमाल अमरोही को हिंदी फिल्मों के शीर्ष निर्देशकों की पंक्ति में खड़ा कर दिया। मीना कुमारी इस फिल्म की हीरोइन थीं, जो कमाल अमरोही की पत्नी थीं। ‘पाकीजा’ की शूटिंग के दौरान दोनों के संबंध बहुत खराब हो चुके थे। मीना कुमारी का दिल बुरी तरह से टूट चुका था और वो मरणासन्न हो गई थीं। फिल्म की कहानी भी कुछ ऐसी थी कि नायिका प्यार खोजती है, लेकिन ना तो उसको प्यार मिलता है, ना ही सुकून। फिल्म ‘पाकीजा’ में बुरी तरह टूटे हुए दिल वाली नायिका में दर्शकों को मीना कुमारी की रीयल लाइफ की कहानी नजर आई थी। ‘पाकीजा’ फिल्म की शूटिंग के दौरान मीना कुमारी इतनी बीमार थीं कि मुजरा करने की स्थिति में नहीं थीं। ऐसे में कमाल अमरोही ने तय किया कि मीना कुमारी के डांस सीक्वेंस को पद्मा खान से करवाया जाए।
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पद्मा खान की कद-काठी मीना कुमारी जैसी थी और उनको बुर्का पहनाकर क्लाइमैक्स का डांस शूट करवाया गया था। कैमरे और उसके उपयोग की कमाल अमरोही को कमाल की समझ और जानकारी थी। इस फिल्म को 35 एमएम कैमरे पर शूट किया गया था। कमाल अमरोही ने रील देखकर बता दिया था कि शूट किए गए कुछ सीन आउट आफ फोकस हैं। विदेश में दो बार जांच हुई तब जाकर ये बात पकड़ में आ सकी।
भारत पाकिस्तान युद्ध की वजह से फिल्म में हुई देर
‘पाकीजा’ को पहले 1971 में प्रदर्शित होना था, लेकिन भारत-पाकिस्तान युद्ध के कारण प्रदर्शन की तिथि टली। 1972 में ये फिल्म प्रदर्शित हुई। 1971 के भारत- पाकिस्तान युद्ध में भारत की विजय हुई तो शिमला समझौते के लिए भुट्टो शिमला आए थे। वहां भुट्टो और उनकी टीम ने ‘पाकीजा’ देखने की इच्छा जताई। कई पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि इंदिरा गांधी ने पराजित पाकिस्तान के नेताओं के लिए ‘पाकीजा’ की स्क्रीनिंग की व्यवस्था करवाई थी।
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कमाल अमरोही के निर्देशन में बनी आखिरी फिल्म ‘रजिया सुल्तान’ थी। कमाल अमरोही ने कम फिल्में कीं, लेकिन ‘महल’ और ‘पाकीजा’ में उनके निर्देशन ने उनकी प्रतिभा का रंग दर्शकों को बखूबी दिखाया।
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