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दिल्ली हाईकोर्ट का अहम फैसला: बच्चे की सुरक्षा सर्वोपरि, आरोपों पर विचार किए बिना घट सकते हैं मुलाकात के अधिकार

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जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। अलग-अलग रह रहे बच्चे से स्वजन के मिलने के अधिकार से जुड़ी एक याचिका पर अहम निर्णय सुनाते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि बच्चे की सुरक्षा की भावना सबसे जरूरी है। अदालत ने कहा कि माता-पिता को नियमित और सार्थक मुलाकात का अधिकार है, लेकिन अगर हालात बच्चे की सुरक्षा की भावना या मनोवैज्ञानिक स्थिरता के लिए खतरा दिखाते हैं, तो माता-पिता के बीच आरोपों पर फैसला किए बिना भी मिलने के अधिकार को कम किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति अनिल क्षत्रपाल व न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर की पीठ ने कहा कि अंतरिम मुलाकात तय करने के स्तर पर कोर्ट को विवादित तथ्यों पर पक्के नतीजे देने की जरूरत नहीं है। जरूरत इस बात की है कि यह मूल्यांकन किया जाए कि आरोप और हालात कुल मिलाकर, ऐसी चिंताएं पैदा करते हैं या नहीं, जिनका बच्चे के कल्याण पर बुरा असर पड़ सकता है।

अदालत ने उक्त टिप्पणी करते हुए एक पिता की अपील याचिका खारिज कर दी। व्यक्ति ने नाबालिग बच्चे के साथ अपनी अंतरिम मुलाकात के अधिकारों को कम करने वाले पारिवारिक अदालत के आदेश को चुनौती दी थी। अपीलकर्ता ने तर्क दिया था कि भौतिक मुलाकात में कमी माता-पिता से अलगाव के बराबर है और यह उसके खिलाफ लगाए गए बिना सुबूत वाले आरोपों पर आधारित है।

महिला ने आरोप लगाया था कि ससुराल के घर में व्यक्ति ने बिजली काट दी थी और सीसीटीवी कैमरों से छेड़छाड़ की थी। वहीं, महिला ने तर्क दिया था कि उनकी नाबालिग बेटी स्कूल जाने की उम्र की है और उसे स्थिरता, रूटीन और पढ़ाई के साथ-साथ को-करिकुलर एक्टिविटीज के लिए पर्याप्त समय की जरूरत है। यह भी तर्क दिया था कि पूर्व की मुलाकात व्यवस्था में बच्चे को हफ्ते में सीमित समय के लिए कई भौतिक मुलाकात में शामिल होना पड़ता था, इससे बार-बार यात्रा करनी पड़ती थी और रोजाना का शेड्यूल बिगड़ता था।

महिला ने तर्क से सहमति जताते हुए पीठ ने कहा कि 29 जनवरी 2025 की प्राथमिकी साथ ही माता-पिता के बीच चल रहे विवादों के आरोप लगातार कलह की स्थिति को दर्शाते हैं। इसका बच्चे की भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक स्थिति पर असर पड़ सकता है। उक्त तथ्यों को देखते हुए पीठ ने मामले में हस्तक्षेप करने से इन्कार करते हुए अपील याचिका खारिज कर दी।
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