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स्वामी विवेकानंद ने मेरठ में मनाया था अपना जन्‍मदि‍न, यहां है वह स्थान, जहां लगाते थे ध्यान, ग्रंथों का किया अध्ययन

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स्वामी विवेकानंद, मेरठ में सेठजी का बाग स्थित उनका निवास रहा भवन।



अमित तिवारी, मेरठ। देश में हर वर्ष 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की जयंती पर राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है। इस दिन का मुख्य उद्देश्य युवाओं को उनके प्रेरणादायक विचारों व आदर्शों से परिचित कराना है। खास बात यह है क‍ि 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में जन्‍में स्‍वामी विवेकानंद ने अपनी युवावस्‍था के निर्णायक महीने क्रांतिधरा मेरठ में बिताए।

भारतवर्ष के युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद का जीवन केवल शिकागो के ऐतिहासिक संबोधन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके देशव्यापी भ्रमण के दौरान कई नगर उनके विचारों से आलोकित हुए।
वह वर्ष 1890 के अंतिम महीनों से 1891 की शुरुआत तक मेरठ में रहे। जब वे यहां पहुंचे, तब लगातार यात्राओं और कठिन पर्वतीय प्रवास के कारण वे गंभीर रूप से अस्वस्थ और कमजोर थे। चिकित्सकीय सलाह पर उन्होंने मैदानों में ठहरने का निर्णय लिया और मेरठ को अपना पड़ाव बनाया।
यहीं कुछ महीनों के प्रवास के दौरान उन्होंने स्वास्थ्य लाभ किया और मानसिक व बौद्धिक रूप से स्वयं को नई ऊर्जा से भर लिया।
सेठजी के बाग में रहा स्वामीजी का निवास

स्वामी विवेकानंद का निवास मेरठ सिटी रेलवे स्टेशन के पास मंसा देवी मंदिर के पीछे स्थित ‘सेठजी के बाग’ में रहा। यह स्थान योगेश्वर बाबू (बाद में स्वामी ज्ञानानंद) से जुड़ा था, जो स्वामीजी के निकट सहयोगी रहे।

यहां का वातावरण आध्यात्मिक था। शास्त्र अध्ययन, भजन-कीर्तन और गहन चिंतन स्वामीजी की दिनचर्या का हिस्सा थे। यह स्थान उन्हें बंगाल के बरानगर मठ की स्मृति कराता था। यह स्थान आज जंगल में तब्दील हो गया है लेकिन स्थित खंडहर भवन, स्नान कुंड, महिलाओं के स्थान के लिए सुरक्षित स्थान, बर्गद के पेड़ के तले स्थित कुंआ और ध्यान लगाने के लिए उपयुक्त स्थान स्वामीजी के आध्यात्म जीवन का आभास कराते हैं।

अफसोस इा बात का है कि जो स्थान स्वामी विवेकानंद की ऊंर्जा और प्रेरणा का स्रोत पीढ़ियों के लिए बन सकता था, वह आज खंडहर और जंगल-झाड़ियों से घिरा है जहां असामाजिक तत्व अपना डेरा डालने लगे हैं।
टाउन हाल पुस्तकालय से ज्ञान-साधना

मेरठ प्रवास के दौरान स्वामी विवेकानंद नियमित रूप से टाउन हाल स्थित तिलक पुस्तकालय जाया करते थे। वे यहां से पुस्तकें लाकर अध्ययन करते थे। पुस्तकालय के कर्मचारी उनकी असाधारण पढ़ने की गति और गहरी बौद्धिक क्षमता से अभिभूत रहते थे।

संस्कृत साहित्य के अनेक ग्रंथ, जैसे अभिज्ञान शाकुंतलम, मृच्छकटिका, कुमार संभव और विष्णु पुराण, उनके अध्ययन का हिस्सा रहे।
मेरठ में मनाया जन्मदिवस

इतिहासकारों के अनुसार, स्वामी विवेकानंद ने नववर्ष 1891 का स्वागत मेरठ में ही किया। इतना ही नहीं, वर्ष 1891 में उन्होंने अपना 28वां जन्मदिवस भी मेरठ में मनाया। यह तथ्य मेरठ के लिए विशेष गौरव का विषय है।

इतिहासकार प्रो. केडी शर्मा और डा. अमित पाठक के शोधों ने स्वामीजी के मेरठ प्रवास के इन पक्षों को सामने लाकर नगर के ऐतिहासिक महत्व को और प्रखर किया है। इस स्थान को युवाओं की प्रेरणास्रोत का प्रमुख केंद्र के तौर विकसित किया जा सकता है। साथ ही सिटी स्टेशन के बेहद निकट होने के कारण यह पर्यटन के लिहाज से भी बहुत अच्छा केंद्र बन सकता है।
सैन्य परेड और समाज का अवलोकन

उस समय मेरठ छावनी क्षेत्र में भारतीय सैन्य टुकड़ियां तैनात थीं। स्वामी विवेकानंद अक्सर रेलवे स्टेशन से लेकर औघड़नाथ मंदिर क्षेत्र तक होने वाली सैन्य गतिविधियों और परेड को देखा करते थे। इससे उन्हें राष्ट्र, अनुशासन और संगठन की शक्ति का प्रत्यक्ष अनुभव मिला, जो आगे चलकर उनके राष्ट्रवादी विचारों में परिलक्षित हुआ। वह भारतीय सैनिकों में भी अपनी माटी के प्रति अकूट देशभक्ति देखकर प्रसन्न व प्रेरित होते थे।
मेरठ से दिल्ली की ओर प्रस्थान

स्वास्थ्य में सुधार और मन में स्पष्ट उद्देश्य के साथ स्वामी विवेकानंद ने मेरठ से दिल्ली के लिए प्रस्थान किया। इतिहासकारों के मतानुसार, वे मेरठ में लगभग तीन से साढ़े चार महीने तक रहे। मेरठ उनके लिए केवल विश्राम का स्थल नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, अध्ययन और आगामी महान यात्राओं की तैयारी का केंद्र बना।
स्वामी विवेकानंद की यात्रा का निर्णायक पड़ाव बना मेरठ

मेरठ का यह प्रवास स्वामी विवेकानंद के जीवन में एक संक्रमणकाल साबित हुआ। यहीं उन्होंने बीमारी से उबरकर वह मानसिक दृढ़ता और वैचारिक स्पष्टता पाई, जिसने आगे चलकर उन्हें विश्व मंच पर भारत की आध्यात्मिक चेतना का प्रतिनिधि बनाया।
इस दृष्टि से मेरठ न केवल क्रांति की भूमि है, बल्कि स्वामी विवेकानंद की चेतना-यात्रा का भी एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
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