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बिहार की नोलढेंगा राजवाड़ी, 52 दरवाजे और 53 खिड़कियों में कैद है एक राजा की खामोश मौत की दास्तां

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नोलढेंगा राजवाड़ी का परिसर। (जागरण)



संवाद सूत्र, सिमुलतला (जमुई)। बिहार का मिनी शिमला, यानी सिमुलतला। यहां की फिजाओं में आज भी राजशाही दौर की एक ऐसी कहानी तैर रही है जो जितनी भव्य है, उतनी ही दर्दनाक भी।

करीब 20 एकड़ में फैला नोलढेंगा राजवाड़ी का परिसर सिर्फ ईंट-पत्थरों से बनी इमारत नहीं, बल्कि रईसी, त्रासदी और कला का एक ऐसा ऐतिहासिक दस्तावेज है, जिसके हर कोने में रहस्य दफन हैं।

करीब 150 वर्ष पूर्व बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) के नोलढेंगा के राजा ने सिमुलतला की स्वास्थ्यवर्धक आबोहवा में चेंज ऑफ एयर के लिए इस नायाब महल की नींव रखी थी। पाश्चात्य और भारतीय शैली के संगम से बने इस महल में 52 दरवाजे और 53 खिड़कियां हैं जो उस दौर की भव्यता का परिचायक हैं।

इसकी मजबूती के लिए विशेष तौर पर मेड इन इंग्लैंड लोहे का इस्तेमाल किया गया था। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि कभी यहां शामें गुलजार होती थीं, झाड़-फानूसों से महल जगमगाता था और अस्तबल में अरबी घोड़ों की टाप गूंजती थी।
जनेऊ की मर्यादा और एक गलतफहमी बनी काल

इस राजवाड़ी की खूबसूरती के पीछे एक रोंगटे खड़े कर देने वाला इतिहास छिपा है। राजा ने सुरक्षा का कड़ा नियम बनाया था कि रात में तीन बार आवाज देने पर यदि कोई न बोले, तो उसे गोली मार दी जाए। दुर्भाग्यवश, यह आदेश ही राजा के लिए काल बन गया।

किंवदंतियों के अनुसार, एक रात राजा लघुशंका के लिए निकले। लौटते वक्त अंधेरे में संतरी ने उन्हें रोका। चूंकि राजा लघुशंका से निवृत्त होकर आ रहे थे और रीत अनुसार उनके कान पर जनेऊ चढ़ा हुआ था, इसलिए धार्मिक मर्यादा के कारण वे मौन रहे।

संतरी ने अपने ही राजा के आदेश का पालन करते हुए गोली चला दी। इस वियोग को रानी बर्दाश्त न कर सकीं और उन्होंने भी राजवाड़ी के कुएं में छलांग लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। तब से यह महल वीरान हो गया।
फिल्मी दुनिया का पसंदीदा कैनवास

समय की मार झेल रहे इस वीरान महल ने भारतीय सिनेमा को एक अद्भुत लोकेशन दी है। इसकी रहस्यमयी बनावट और ऊंचे गुंबद इसे हार और पीरियड ड्रामा फिल्मों के लिए निर्देशकों की पहली पसंद बनाते हैं। सत्यजीत रे और तपन सिन्हा जैसे दिग्गजों से लेकर वर्तमान दौर के फिल्मकारों तक ने इसे कैमरे में कैद किया है।

नवाजउद्दीन सिद्दीकी की अनवर का अजब किस्सा हो, पंकज त्रिपाठी का अभिनय हो, या बंगाली सुपरस्टार प्रसेनजीत की फिल्में, इन खंडहरों ने कई किरदारों को जीवंत किया है। आज यह ऐतिहासिक धरोहर महज एक सेल्फी प्वाइंट बनकर रह गई है। स्थानीय बुद्धिजीवियों का मानना है कि यदि सरकार इसे संरक्षित करे तो नोलढेंगा राजवाड़ी बिहार के हेरिटेज टूरिज्म में मील का पत्थर साबित हो सकती है।

जरूरत है कि इतिहास के इस अनमोल पन्ने को बिखरने से बचाया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां इसकी भव्यता और उस खामोश राजा की कहानी को महसूस कर सकें।
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