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₹5 लाख की सैलरी पर डॉक्टर तो मिल जाएगा, लेकिन ₹5 करोड़ की मशीन बिना कैसे धड़केगा दिल?

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कैथ लैब



अनूप गुप्ता, जागरण, बरेली। पिछले हफ्ते डिप्टी सीएम बृजेश पाठक के सामने स्वास्थ्य विभाग के पास हृदय रोग विशेषज्ञ न होने का मामला उठा तो बताया गया कि रिवर्स बिडिंग के जरिये जल्द ही कार्डियोलाजिस्ट मिल जाएगा। इसके लिए शासन पांच लाख रुपये हर महीने वेतन देने तक को तैयार है, लेकिन बड़ा सवाल ये है कि दिल का डाक्टर मिलने के बाद भी एंजियोग्राफी और एंजियो प्लास्टी के लिए करीब पांच करोड़ की लागत से कई महंगे उपकरणों वाली कैथ लैब भी चाहिए।

इसमें चार-पांच कार्डियक टेक्नीशियन और अन्य ट्रेंड स्टाफ के साथ तमाम महंगे उपकरण उपलब्ध हो। इसके बगैर कार्डियोलाजिस्ट की नियुक्ति अगर हो जाएगी तो कोई खास फायदा नहीं होने वाला है। स्वास्थ्य विभाग के पास लंबे समय से कार्डियोलाजिस्ट नहीं है। वर्ष 2018 में डा. वेद प्रकाश भारद्वाज के जाने के बाद से यह पद खाली चल रहा है। ऐसे में दिल के मरीजों का सरकारी इलाज ठप पड़ा हुआ है।
व‍िभाग के सामने चुनौती है कैथ लैब

पिछले हफ्ते शहर में आए डिप्टी सीएम बृजेश पाठक के सामने जब यह मुद्दा उठा तो उन्होंने इसे गंभीरता से लिया और वहां मौजूद सीएमओ डा. विश्राम सिंह की मौजूदगी में रिवर्स बिडिंग पर कोर्डियालोजिस्ट की तैनाती के निर्देश भी दिए लेकिन विभाग के सामने चुनौती कैथ लैब को लेकर खड़ी है। जब तक यह कैथ लैब उपलब्ध नहीं हो जाती, तब तक कोरोनरी एंजियोग्राफी के साथ एंजियो प्लास्टी कर पाना नामुमकिन है।

दरअसल, कोरोनरी एंजियोग्राफी के जरिये मरीज की हृदय की धमनियों में रक्त प्रवाह की जांच के लिए की जाती है। इसमें एक कैथेटर को हृदय की धमनियों तक पहुंचाया जाता है। इससे एक्स-रे इमेजिंग के जरिये धमनियों की संरचना और कार्य का आकलन होता है। इसी में स्टेंट प्लेसमेंट की प्रक्रिया भी शामिल है। इसमें एंजियोप्लास्टी के बाद, अक्सर एक स्टेंट (छल्ला) को धमनी में डाला जाता है।
कैथ लैब की प्रक्र‍ियाएं बेहद वि‍श‍िष्‍ट

एंजियोप्लास्टी कम चीर-फाड़ वाली प्रक्रिया है, जो संकुचित या बंद धमनियों को खोलने के लिए एक छोटे गुब्बारे और अक्सर स्टेंट का उपयोग करती है। ताकि रक्त प्रवाह में सुधार हो सके। हार्ट स्पेशलिस्टों का कहना है कि कैथ लैब में प्रक्रियाएं बेहद विशिष्ट और तकनीकी होती हैं।

इसलिए इन्हें अनुभवी चिकित्सकों और तकनीशियनों की जरूरत होती है। इसके लिए उपकरणों आदि के लिए कम से कम पांच करोड़ के बजट की जरूरत है। ऐसे में कैथ लैब को शुरू करा पाना स्वास्थ्य अधिकारियों के लिए चुनौतीपूर्ण है। ऐसे में कोर्डियोलाजिस्ट की नियुक्ति होने के बावजूद इसका कोई खास फायदा मरीजों को मिलता नहीं दिखाई दे रहा है।
विभाग के पास अभी तो ईको तक की सुविधा नहीं

मंडल स्तरीय जिला चिकित्सालय में हृदय रोगियों के इलाज की बात करें तो यहां अब तक हार्ट की जांच के लिए ईको जैसी सामान्य मशीन तक उपलब्ध नहीं है। अभी कोई दिल का रोगी अस्पताल पहुंच भी जाता है तो उसे कोई फिजीशियन देखकर पर्चे पर दवाइयां लिख देता है। अगर ज्यादा जरूरी लगा तो ईसीजी करा ली जाती है। ऐसे में हार्ट के गंभीर रोगियों को मजबूरी में प्राइवेट हास्पिटल जाना पड़ रहा है। हालांकि वहां ओपीडी से लेकर जांच और इलाज-दवा का इतना ज्यादा खर्च है कि आम मरीजों के उसे सुनकर ही होश उड़ रहे हैं।
अभी तो स्टेमी पर भी भरोसा नहीं कर रहे मरीज

दिल के रोगियों को प्राथमिक इलाज देने के लिए जिला चिकित्सालय में इमरजेंसी वार्ड के पास करीब दो महीने पहले स्टेमी की शुरुआत की गई थी। चिकित्सकों का कहना था कि अगर किसी मरीज को हार्ट अटैक आ जाता है तो यहां इंजेक्शन व दवाइयां देकर उसकी फर्स्ट एड की व्यवस्था है। उसके बाद उसे रेफर कर दिया जाना है। जबकि मरीजों का भरोसा स्टेमी के इलाज पर नहीं हो रहा है। यहां नाममात्र के दो-तीन मरीज आए भी तो जांचें कराकर दवा लिए बगैर ही वापस चले गए। स्टेमी में एक भी मरीज के भर्ती होने का रिकार्ड विभाग के पास नहीं है।




कैथ लैब की व्यवस्था अभी नहीं है। इसे लेकर शासन के निर्देश के बाद ही कुछ कहा जा सकता है। अभी जो सुविधाएं मौजूद है, उसके जरिये बेहतर इलाज देने का पूरा प्रयास किया जा रहा है।

- डा. अजय मोहन अग्रवाल, प्रभारी अपर निदेशक व प्रमुख अधीक्षक स्वास्थ्य





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