मेडिकल एआई : सुविधा के साथ खतरे भी, मरीजों की सुरक्षा को लेकर डॉक्टर चिंतित
https://www.jagranimages.com/images/2026/01/16/article/image/Medical-AI-1768510066859.jpgफोटो- AI Generated
अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। हेल्थकेयर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को भविष्य की क्रांतिकारी तकनीक के रूप में तेजी से अपनाया जा रहा है। जांच की गति बढ़ाने, विशेषज्ञों की कमी को पूरा करने और दूर-दराज इलाकों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में एआई को बड़ा समाधान बताया जा रहा है।
लेकिन इसी के साथ एआई के अनियंत्रित व गैर जिम्मेदाराना उपयोग तथा निष्कर्ष से मरीजों की सुरक्षा को लेकर गंभीर खतरे भी सामने आने लगे हैं। इन खतरों को दिल्ली एम्स के पूर्व रेडियोलाजिस्ट, हेल्थकेयर एआई शोधकर्ता डॉ. शुभ्रंकर दत्ता ने अपने एक्स (पूर्व ट्विटर) पोस्ट में एआई बनाम वास्तविक क्लिनिकल समझ के तौर एआई की गलतियों को उजागर किया है, जिसे चिकित्सकों का भारी समर्थन मिल रहा है।
दोहरा मापदंड मेडिकल एआई का सबसे बड़ा खतरा
प्रश्न किए जा रहे हैं कि यदि ऐसी रिपोर्ट किसी मानव रेडियोलाजिस्ट की होती, तो उस पर मेडिकल काउंसिल की कार्रवाई, कानूनी जांच और पेशेवर जवाबदेही तय होती। पर, एआई के मामले में उन्हीं गलतियों को ‘ब्रेकथ्रू’ बताकर सराह जा रहा है। डा. दत्ता के अनुसार यही दोहरा मापदंड मेडिकल एआई का सबसे बड़ा खतरा है।
डॉ. शुभ्रंकर दत्ता ने वायरल सोशल मीडिया पोस्ट, जिसमें गूगल के ओपन-सोर्स मेडिकल एआई माडल मेड जेम्मा ने ब्रेन एमआरआइ देखकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की पुष्टि करते हुए तत्काल न्यूरोसर्जरी रेफरल की सलाह दी थी। पोस्ट को इंटरनेट मीडिया पर ‘गेम-चेंजर’ और ‘रिमोट क्लिनिक ट्रायेज में क्रांति’ के तौर पर पेश किया जा रहा है।
एआई ने ब्रेन के गलत लोब को किया चिन्हित
रेडियोलाजी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग विशेष कर एआई-ड्रिवन इमेजिंग व एआई बेंचमार्किंग पर शोध कर रहे चिकित्सकों की संस्था फायमा के पूर्व अध्यक्ष डा. शुभ्रंकर दत्ता इसे गलत ठहराते हैं। उनका आरोप है कि जिसे गेम चेंजर व रिमोट क्लिनिक ट्रायेज क्रांति के तौर पर पेश किया जा रहा है, उसमें कई आधारभूत और खतरनाक गलतियां हैं।
वह बताते हैं कि जब इस एमआरआइ को प्रशिक्षित रेडियोलाजिस्ट ने देखा तो निष्कर्ष बिल्कुल अलग थे। एआई ने ब्रेन के गलत लोब को चिन्हित किया, सिर्फ एक एमआरआइ स्लाइस के आधार पर इमरजेंसी, मालिग्नेंसी (कैंसर) और सर्जरी जैसे निष्कर्ष दे दिए। जबकि वास्तविक चिकित्सा अभ्यास में पूरी एमआरआइ सीक्वेंस, मरीज की क्लिनिकल हिस्ट्री और अन्य जांचों को एक साथ रखकर ही कोई राय बनाई जाती है।
डॉ. शुभ्रंकर दत्ता ने इन उदाहरण के हवाले से कहाकि यह काम योग्य चिकित्सक ही कर सकता है, एआई नहीं। कहाकि सोशल मीडिया पर वायरल ओपन-सोर्स मेडिकल एआई माडल मेड-जेम्मा ने एआई ने स्कैन पहले से ही कांट्रास्ट एमआरआइ होने के बावजूद दोबारा कांट्रास्ट कराने की सलाह दी। जो यह बताता है कि एआई मॉडल इमेज को संदर्भ के साथ समझने में सक्षम नहीं था और गलत निष्कर्ष दे रहा था।
भारत के संदर्भ में चिंता गंभीर
रेडियोलाजिस्ट और हेल्थकेयर एआई शोधकर्ता डा. शुभ्रंकर दत्ता के अनुसार भारत के संदर्भ में यह चिंता और भी गंभीर हो जाती है। क्योंकि विदेशी डाटा पर प्रशिक्षित एआई माडल भारतीय मरीजों की विविधता, रोग पैटर्न और संसाधन सीमाओं को सही ढंग से नहीं समझ पाते। आशंका जताई कि सीमित विशेषज्ञों और तेजी से बढ़ते डिजिटल हेल्थ सिस्टम के बीच अगर ऐसे ओपन-सोर्स मेडिकल एआई का बिना रेगुलेशन उपयोग हुआ, तो इसका सीधा नुकसान मरीजों को उठाना पड़ सकता है।
कहा कि कि यह बहस एआई बनाम चिकित्सक की नहीं, बल्कि अनियंत्रित तकनीक बनाम मरीज की सुरक्षा की है। सलाह दी कि जब तक मेडिकल एआई को कड़े क्लिनिकल वैलिडेशन, भारतीय संदर्भ में परीक्षण, स्पष्ट कानूनी जवाबदेही और ह्यूमन-इन-द-लूप प्रणाली के दायरे में नहीं लाया जाता, तब तक इसकी ज्यादा जरूरी इसकी कड़ी निगरानी है।
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