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उज्बेकिस्तान में बच्चों की मौत की जिम्मेदार सीरप निर्माता कंपनी निदेशक की मुश्किलें बढ़ीं, हाई कोर्ट से नहीं मिली राहत

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तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण



विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। उज्बेकिस्तान में 18 बच्चों की मौतों की वजह माने गए सीरप निर्माता कंपनी के निदेशक और अन्य अधिकारियों को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राहत देने से इन्कार कर दिया है। न्यायमूर्ति हरवीर सिंह की एकलपीठ ने मेसर्स मैरियन बायोटेक प्राइवेट लिमिटेड और पांच अन्य की आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाएं खारिज करते हुए कहा है कि निदेशक और कंपनी के अधिकारी अपराध के लिए जवाबदेही से बच नहीं सकते और मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) की अदालत से जारी समन सही है।

कंपनी के खिलाफ आरोप है कि उसने औद्योगिक ग्रेड प्रोपाइलीन ग्लाइकोल का उपयोग किया है, जो दवाओं के निर्माण में प्रतिबंधित है। ड्रग्स इंस्पेक्टर ने जो नमूने लिए और उसकी जांच में पाया गया है कि दवाएं मानक के अनुसार नहीं थीं। कोर्ट ने माना है कि ड्रग्स और कास्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत लगाए गए आरोपों के आधार पर कंपनी के निदेशक और अधिकारी कामकाज में शामिल हैं।

केंद्र सरकार के अधिवक्ता का कहना था कि तकनीकी आपत्तियां सार्वजनिक स्वास्थ्य कानूनों का उल्लंघन नहीं कर सकती हैं। कंपनी ने नकली टेस्ट लैब रिपोर्ट बनाई है और प्रकरण राज्य बनाम भजनलाल मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के दायरे में नहीं आता। कोर्ट को बताया गया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 11 जनवरी 2023 को मेडिकल प्रोडक्ट अलर्ट जारी किया था।

इसमें कहा गया था कि एम्ब्रोनोल सीरप और डोक-1 मैक्स सीरप में डाइइथाइलीन ग्लाइकोल और इथाइलीन ग्लाइकोल की अस्वीकार्य मात्रा है और यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। ग्लाइकोल के सेवन से सीएनएस, कार्डियोपल्मोनरी और रीनल फेल्योर (गुर्दों का काम न करना) जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

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याचीगण की तरफ से कहा गया था कि टेस्ट एनालिसिस रिपोर्ट अधूरी है। नमूना लेने की प्रक्रिया भी गलत है, क्योंकि इसे बिक्री/वितरण बिंदु से नहीं लिया गया था। आरोपितों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी स्पष्ट नहीं है। पदनाम से ही उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। याचिकाएं सीजेएम गौतमबुद्ध नगर के 19 जनवरी 2024 को पारित संज्ञान और समन आदेश के खिलाफ दायर की गई थीं।

ड्रग्स और कास्मेटिक्स एक्ट, 1940 की विभिन्न धाराओं में थाना फेज तीन नोएडा में केस दर्ज किया गया है। इसमें पांच साल कैद और 10 हजार रुपये जुर्माने का प्रविधान है। कोर्ट ने कहा, जन स्वास्थ्य को हानि से जुड़े अपराध को तकनीकी आपत्ति के आधार पर दरकिनार नहीं किया जा सकता।
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