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‘महेन्द्र सिंह तुम जिंदा हो खेतों में, खलिहानों में…’ पुण्यतिथि पर भाकपा माले ने दी श्रद्धांजलि, उमड़ा जनसैलाब

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शहीद महेन्द्र सिंह की प्रतिमा के सामने सलामी देते भाकपा माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य।



जागरण संवाददाता, बगोदर (गिरिडीह)। भाकपा (माले) के वरिष्ठ नेता और बगोदर विधानसभा के पूर्व विधायक महेन्द्र सिंह की 21वीं पुण्यतिथि उनके पैतृक गांव खम्भरा में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई गई। 16 जनवरी 2005 को बगोदर में माओवादियों ने उनकी हत्या कर दी थी, जिससे न सिर्फ गिरिडीह बल्कि पूरे राज्य की राजनीति में शोक की लहर दौड़ गई थी। इस अवसर को पार्टी ने बलिदान दिवस के रूप में मनाया। साथ ही उनकी पत्नी शांति देवी की पुण्यतिथि भी श्रद्धापूर्वक मनाई गई।

पुण्यतिथि के मौके पर आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में भाकपा (माले) के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य, बगोदर के पूर्व विधायक विनोद कुमार सिंह, राजधनवार के पूर्व विधायक राजकुमार यादव, उप प्रमुख हरेंद्र सिंह, माले के प्रखंड सचिव परमेश्वर महतो सहित बड़ी संख्या में पार्टी नेता, कार्यकर्ता और स्थानीय ग्रामीण मौजूद रहे। सभी ने बारी-बारी से महेन्द्र सिंह की प्रतिमा और उनकी पत्नी शांति देवी के चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। इस दौरान एक मिनट का मौन रखकर दोनों को याद किया गया।

श्रद्धांजलि सभा में “महेन्द्र सिंह तुम जिंदा हो खेतों में, खलिहानों में”, “महेन्द्र सिंह अमर रहें” और “लाल सलाम” जैसे नारे लगाए गए, जिससे पूरा इलाका गूंज उठा। वक्ताओं ने महेन्द्र सिंह के संघर्षपूर्ण राजनीतिक जीवन को याद करते हुए कहा कि वे गरीबों, किसानों और मजदूरों की बुलंद आवाज थे। उन्होंने अन्याय, शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ आजीवन संघर्ष किया और जनआंदोलनों को मजबूती दी।

इसके बाद श्रद्धांजलि कार्यक्रम का क्रम आगे बढ़ाते हुए बगोदर-सरिया रोड स्थित किसान भवन के पास महेन्द्र सिंह की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया। तत्पश्चात बगोदर बस पड़ाव में स्थित उनकी आदमकद प्रतिमा पर भी पुष्प अर्पित किए गए। हर स्थान पर बड़ी संख्या में समर्थक और आम लोग मौजूद रहे।

अंत में बगोदर बस स्टैंड परिसर में संकल्प सभा का आयोजन किया गया, जहां नेताओं और कार्यकर्ताओं ने महेन्द्र सिंह के अधूरे सपनों को पूरा करने, सामाजिक न्याय, समानता और जनहित की लड़ाई को और तेज करने का संकल्प लिया। सभा में वक्ताओं ने कहा कि महेन्द्र सिंह के विचार आज भी जीवित हैं और संघर्ष के रास्ते पर चलकर ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है।
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