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आधुनिक दौर में पुरानी मानसिकता, दिल्ली में फैमिली प्लानिंग का बोझ अब भी महिलाओं पर, 2% ही है पुरुष नसबंदी

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नसबंदी को आज भी मर्दाना कमजोरी मानते हैं दिल्ली के पुरुष। फाइल फोटो



अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। इक्कीसवीं सदी में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं, सरकारी प्रोत्साहन योजनाओं और लगातार चल रहे जागरूकता अभियानों के बावजूद राष्ट्रीय राजधानी के पुरुषों की मानसिकता आज भी नसबंदी को लेकर नहीं बदली है। दिल्ली में परिवार नियोजन से जुड़े ताजा सरकारी आंकड़े इस सामाजिक सच्चाई को उजागर करते हैं कि पुरुष आज भी नसबंदी को अपनी मर्दाना ताकत की कमजोरी से जोड़कर देखते हैं।

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वर्ष 2024-25 के दौरान राजधानी में कुल 14,543 नसबंदी हुईं, लेकिन इनमें से सिर्फ 301 मामलों में ही पुरुषों ने इसे अपनाया। यानी करीब 98 प्रतिशत नसबंदी महिलाओं को ही करानी पड़ी। यह स्थिति कोई एक साल की नहीं है, बल्कि बीते चार वर्षों से दिल्ली में यही स्थिति बनी हुआ है, जहां पुरुष नसबंदी की हिस्सेदारी कभी भी तीन प्रतिशत से ऊपर नहीं जा सकी।

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स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि नसबंदी एक सरल, सुरक्षित और कम जोखिम वाली प्रक्रिया है, जो महिला नसबंदी की तुलना में कहीं कम जटिल मानी जाती है। इसके बावजूद पुरुषों में यह धारणा गहराई से बैठी है कि नसबंदी कराने से उनकी शारीरिक क्षमता और यौन शक्ति पर असर पड़ता है, जबकि चिकित्सा विज्ञान इस सोच का समर्थन नहीं करता।

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जागरूकता अभियानों और आर्थिक प्रोत्साहन से बढ़ावा

सरकार की ओर से समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाए गए हैं। पुरुष नसबंदी को बढ़ावा देने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन भी तय किया गया है, लेकिन दिल्ली में जमीनी स्तर पर इसका असर बेहद सीमित नजर आता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति लंबे समय तक महिलाओं पर केंद्रित रही, जिससे परिवार नियोजन को भी महिलाओं की जिम्मेदारी के रूप में देखा जाने लगा।

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समाजशास्त्रियों का मानना है कि जब तक परिवार नियोजन को साझा जिम्मेदारी के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाएगा और पुरुषों को निर्णय प्रक्रिया में बराबरी का भागीदार नहीं बनाया जाएगा, तब तक यह असंतुलन बना रहेगा। मौजूदा आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि समस्या केवल योजनाओं की नहीं, बल्कि सोच और सामाजिक मानसिकता की है, जिसे बदलना अब सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।

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