इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा- देश की पुलिस व मजिस्ट्रेटों को प्रशिक्षित किए जाने की जरूरत
https://www.jagranimages.com/images/2026/01/17/article/image/Allahabad-High-Court-1768660661566.webpइलाहाबाद हाई कोर्ट ने पुलिस और मजिस्ट्रेटों को धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात के बीच अंतर समझने की आवश्यकता बताई है।
विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि देश की पुलिस व न्यायिक मजिस्ट्रेटों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, ताकि उन्हें पता चले कि कपट तथा आपराधिक न्यास भंग जुड़वां अपराध नहीं हैं। दोनों में अंतर है। दोनों का अस्तित्व अलग है। पुलिस व मजिस्ट्रेटों के दिमाग में कानून को लेकर भ्रम है। वे धारा 406 व 420 में दंडनीय अपराध का अंतर समझ नहीं पा रहे हैं।
यह टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव ने प्रभा सिंह व अन्य की याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए एसीजेएम गोरखपुर द्वारा धारा 406, 420, 467, 468, 471 व 120 बी के तहत याची को जारी समन आदेश रद कर स्थापित विधि व्यवस्था के अनुसार नये सिरे से आदेश जारी करने के लिए प्रकरण वापस कर दिया है।
याची की तरफ से अधिवक्ता अक्षय सिंह रघुवंशी, अरविंद सिंह व बीके सिंह रघुवंशी ने बहस की। इनका कहना था कि कपट तथा आपराधिक न्यास भंग के अपराध में काफी अंतर है। दोनों अन्योन्श्रित नहीं है, बल्कि भिन्न हैं। स्वतंत्र अपराध है। दोनों अपराध एक साथ नहीं किए जा सकते। दिल्ली रेस क्लब केस में सुप्रीम कोर्ट कोर्ट ने साफ कहा है कि कपट में मंशा महत्वपूर्ण है, जो शुरू से ही झूठ व बेईमानी, धोखे से संपत्ति प्राप्त कर हड़पने की होती है जबकि न्यास भंग में विश्वास के साथ वैध तरीके से संपत्ति दी जाती है और बाद में विश्वास तोड़ कर संपत्ति हड़पी जाती है। इसलिए दोनों अपराध एक साथ नहीं किए जा सकते। अदालत से दोनों धाराओं में समन जारी करना उचित नहीं है।
मामला थाना खोराबार, गोरखपुर से जुड़ा है। कोर्ट ने कहा, कपट धारा 415 में है और धारा 420 में दंडनीय है जबकि आपराधिक न्यास भंग धारा 405में है जो धारा 406 में दंडनीय अपराध है। एक अपराध होगा तो उसी समय दूसरा नहीं हो सकता। दोनों धाराओं में एक साथ आपराधिक केस कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती।
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