कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में खाली पड़े पदों को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त, जारी किए अहम निर्देश
https://www.jagranimages.com/images/2026/01/17/article/image/Supreme-Court-On-Orphan-Students-1768661201257.webpरैगिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त। (फाइल फोटो)
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। उच्च शिक्षण संस्थानों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में खाली पड़े पदों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने तय समय में खाली पदों को भरने का आदेश दिया देते हुए कहा है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में खाली पड़े सभी शैक्षणिक और गैर शैक्षणिक पदों को चार महीने में भरा जाए। साथ ही कहा है कि कुलपति और रजिस्ट्रार जैसे प्रशासनिक पदों को रिक्त होने के एक महीने के भीतर भरा जाए।
ये आदेश गुरुवार को न्यायमूर्ति जेबी पार्डीवाला और आर. महादेवन की पीठ ने उच्च शिक्षण संस्थाओं के छात्रों द्वारा आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं से संबंधित मामले में दिए। कोर्ट ने आदेश में कहा कि सरकारी और निजी विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की कमी को ध्यान में रखते हुए, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि फैकेल्टी (संकाय) के सभी रिक्त पदों (शैक्षणिक और गैर शैक्षणिक दोनों) को चार महीने की अवधि में भरा जाए। इसमें वंचित वर्ग के लोगों और कम प्रतिनिधित्व वाले समुदायों के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित पदों को प्राथमिकता दी जाए, जिसमें दिव्यांगजनों के लिए आरक्षित पद भी शामिल हैं।
अदालत के आदेश में क्या?
शीर्ष अदालत ने कहा है कि फैकेल्टी भर्ती के लिए विशेष भर्ती अभियान आयोजित किए जा सकते हैं जो केंद्र और राज्यों के नियमों के अनुसार विभिन्न प्रकार के आरक्षण के अंतर्गत आते हैं। कुलपति, रजिस्ट्रार और अन्य महत्वपूर्ण संस्थागत/प्रशासनिक पदों पर नियुक्ति और रिक्तियों को चार महीने के भीतर किया जाना चाहिए। इसके अलावा उच्च शिक्षण संस्थानों में सुचारु संचालन सुनिश्चित करने के लिए इन पदों को रिक्त होने की तिथि से एक महीने के भीतर भरा जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा चूंकि सेवानिवृत्ति की तिथि पहले से पता होती है इसलिए भर्ती प्रक्रिया काफी पहले शुरू हो जानी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि ऐसे पद एक महीने से ज्यादा समय तक रिक्त न रहें। कोर्ट ने आदेश दिया है कि सभी उच्च शिक्षण संस्थान केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों को सालाना रिपोर्ट देंगे जिसमें यह बताया जाएगा कि कितने आरक्षित पद रिक्त हैं, कितने भरे गए, न भरने के कारण और कितना समय लगा आदि ताकि सम ताकि समय समय पर जवाबदेही सुनिश्चित हो।
छात्रवृत्तियों के भुगतान में देरी पर भी कोर्ट ने लिया संज्ञान
कोर्ट ने छात्रवृत्तियों के भुगतान में देरी और कई बार छात्रों को परीक्षा में बैठने से रोकने आदि की घटनाओं पर भी संज्ञान लिया है क्योंकि इसके चलते छात्रों को तनाव होता है। साथ ही आदेश दिया है कि सभी लंबित छात्रवृत्तियों का बकाया भुगतान संबंधित केंद्रीय और राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा चार महीने के भीतर किया जाए।
यदि भुगतान न होने का कोई कारण हो, तो संबंधित उच्च शिक्षण संस्थान और छात्र को दो महीने के भीतर कारण सहित सूचना भेजी जानी चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भविष्य में दी जाने वाली सभी छात्रवृत्तियों का वितरण संबंधित केंद्रीय और राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा स्पष्ट समय सीमा के भीतर और बिना किसी देरी के किया जाए।
अपरिहार्य प्रशासनिक विलंब के मामलों में भी, उच्च शिक्षण संस्थानों को नीतिगत रूप से छात्रवृत्ति प्राप्तकर्ताओं को उनके पैसे के भुगतान या निपटान के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराना चाहिए। कोर्ट ने आदेश में कहा है कि किसी भी छात्र को परीक्षा में बैठने से नहीं रोका जाना चाहिए, छात्रावास से नहीं निकाला जाना चाहिए, कक्षाओं में भाग लेने से नहीं रोका जाना चाहिए, या छात्रवृत्ति के वितरण में देरी के कारण उनकी मार्कशीट और डिग्री को रोककर नहीं रखा जाना चाहिए। ऐसी किसी भी संस्थागत नीति की सख्ती से जांच की जानी चाहिए।
रैंगिंग को लेकर कोर्ट सख्त
शैक्षणिक संस्थानों में रैगिंग रोकने के बारे में आदेश देते हुए कोर्ट ने कहा है कि सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को विशेष रूप से यह सख्त चेतावनी दी जाती है कि वे उन सभी नियमों का पूर्णत: पालन करें जो उन पर बाध्यकारी हैं, जिनमें यूजीसी का उच्च शिक्षा संस्थानों में रैगिंग की समस्या पर अंकुश लगाने संबंधी रेगुलेशन, 2009, यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) रेगुलेशन 2012, यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में महिला कर्मचारियों और छात्रों के यौन उत्पीड़न की रोकथाम, निषेध और निवारण) रेगुलेशन 2016, यूजीसी (छात्रों की शिकायतों का निवारण) रेगुलेशन 2023, आदि शामिल हैं।
इसके अलावा विशेष रूप से, रैगिंग विरोधी समितियों और रैगिंग विरोधी दस्तों, भेदभाव विरोधी अधिकारियों,आंतरिक शिकायत समितियों और छात्र शिकायत निवारण समितियों की स्थापना औरसंबंधित शिकायत निवारण तंत्रों के लिए विस्तृत प्रक्रियाओं कासख्ती से पालन किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने छात्रों को सुरक्षित वातावरण देने की बात करते हुए देश भर के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को निर्देश दिया है कि वे किसी भी छआत्र की आत्महत्या या अप्राकृतिक मौत की जानकारी मिलते ही पुलिस को सूचित करेंगे।
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