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दिल्ली एम्स ने टेंट के लिए दी जमीन, लेकिन हकीकत में तीमारदारों को खुले में काटनी पड़ रही है रातें

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कड़ाके की ठंड के बीच अस्पतालों के बाहर मरीजों और उनके तीमारदारों की परेशानी बढ़ रही है।



जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। कड़ाके की ठंड के बीच अस्पतालों के बाहर मरीजों और उनके तीमारदारों की परेशानी लगातार सामने आने के बाद आखिरकार सरकार और संस्थान जगे और कुछ कदम उठाए जाने आरंभ हुए हैं। इंटरनेट मीडिया और जनदबाव के बाद अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली ने टेंट लगाने के लिए अपनी भूमि उपलब्ध कराई है, ताकि इलाज के लिए दूर-दराज से आने वाले मरीजों और उनके परिजनों को खुले आसमान के नीचे रात न बितानी पड़े और उन्हें ठंड से कुछ राहत मिल सके।

यह पहल उस समय सामने आई, जब एम्स के बाहर खुले में रात गुजारने को मजबूर मरीजों और उनके तीमारदारों की तस्वीरें और वीडियो सार्वजनिक हुए। इनके सामने आने के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था और सरकारी संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल उठने लगे। इसके बाद सक्रिय हुए तंत्र ने बड़े-बड़े दावों के साथ राहत के कदम उठाने शुरू किए।

कहा गया कि अब कोई भी खुले में नहीं सो रहा है। मरीजों और उनके तीमारदारों को बिस्तर और शेल्टर दोनों उपलब्ध करा दिए गए हैं। परिसर के भीतर आवागमन के लिए ईवी की सुविधा उपलब्ध है। दैनिक जागरण की टीम ने जब इन दावों की मौके पर जाकर पड़ताल की, तो जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती नजर आई।

एम्स परिसर में टेंट लगाए जा रहे हैं। उनके भीतर चारपाइयां और अस्थायी बेड जरूर दिखते हैं, लेकिन ये व्यवस्थाएं अभी अधूरी हैं। कई टेंट खाली पड़े हैं। कुछ जगहों पर बिस्तरों पर तार, पाइप और अन्य निर्माण सामग्री रखी नजर आई, जबकि कई टेंटों में बिजली और रोशनी की व्यवस्था अधूरी दिखी। इस बीच, अस्पताल के बाहर सबवे, सीढ़ियों और दीवारों के किनारे दर्जनों मरीज और उनके तीमारदार अब भी खुले में रात गुजारने को मजबूर हैं।

सबवे में जमीन पर लेटी गया (बिहार) से आईं सरिता देवी ने बताया कि डाक्टर ने भर्ती के लिए कहा है, लेकिन बाहर रहने के लिए अभी कोई जगह नहीं मिली। टेंट लगे हैं, लेकिन वहां जाने की अनुमति नहीं दी गई। मजबूरी में सीढ़ियों के पास ही रात बितानी पड़ रही है। बस्ती उत्तर प्रदेश से आए रामकिशोर ने कहा कि तीन दिन से यहीं हैं। ठंड बहुत है। सुना है कि टेंट लग रहे हैं, लेकिन अभी तक किसी ने अंदर नहीं भेजा।

महिलाओं की स्थिति और भी विकट नजर आई। झारखंड की मीना कुमारी अपनी बीमार मां के साथ सबवे में बैठी मिलीं। उन्होंने बताया कि रात में ठंड काफी बढ़ जाती है। मां बीमार हैं, लेकिन मजबूरी में यहीं सोना पड़ता है। टेंट बने हैं, पर अभी उनके लिए खुले नहीं हैं। राजस्थान के अलवर से आए युवक संदीप ने बताया कि टेंट के अंदर चारपाइयां तो दिख रही हैं, लेकिन वहां अभी कोई सुविधा शुरू नहीं हुई है। न पानी की व्यवस्था है और न ही ठंड से बचाने के इंतजाम।

एम्स की ओर से टेंट लगाने के लिए जमीन उपलब्ध कराना यह संकेत देता है कि स्थिति की गंभीरता को अब जाकर स्वीकार किया गया है। टेंट की तैयारी शुरू हुई है, पर उनकी संख्या, सुविधाओं और त्वरित क्रियान्वयन को लेकर अभी स्पष्टता नहीं है। सरकारी स्तर पर यह तर्क दिया जा रहा है कि राहत के प्रयास चरणबद्ध तरीके से किए जा रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि जब समस्या लंबे समय से मौजूद थी, तो ठंड के चरम पर पहुंचने के बाद ही सक्रियता क्यों दिखाई गई।

कुल मिलाकर, सकारात्मक कदम उठाया तो गया है पर, मौके की स्थिति बताती है कि राहत अभी कागज और तैयारी के स्तर पर ज्यादा है, जमीन पर कम। मरीजों को ठंड से बचाने की शुरुआत तो हुई है, मगर राहत तब ही पूरी मानी जाएगी, जब कोई भी बीमार व्यक्ति अस्पताल के बाहर, सबवे या सीढ़ियों पर ठिठुरता नजर न आए।

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