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प्रकृति और विज्ञान के संगम से समृद्ध किसान स्वस्थ्य समाज की ओर बढ़ता भारत, अपना रहे खेती का नया मॉडल

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प्रकृति और विज्ञान के संगम से समृद्ध किसान स्वस्थ्य समाज की ओर बढ़ता भारत।



शैलेश अस्थाना, वाराणसी। वाराणसी के शाहंशाहपुर स्थित भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (आइआइवीआर) में इन दिनों खेती को देखने और समझने का नजरिया बदल रहा है। यहां विज्ञानी यह साबित करने में जुटे हैं कि खेती केवल रसायनों और कीटनाशकों पर निर्भर नहीं है, बल्कि प्रकृति के भीतर मौजूद अद्भुत शक्ति को समझकर किसान न सिर्फ अधिक उत्पादन कर सकते हैं, बल्कि मिट्टी, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की रक्षा भी कर सकते हैं।

यही सोच भारत को एक नए कृषि युग की दहलीज पर ले जा रही है। आइआइवीआर में हो रहा शोध मल्टीओमिक्स जैसे आधुनिक विज्ञान पर आधारित है। इसके जरिये पौधों के जीन, प्रोटीन और उनके द्वारा बनाए जाने वाले प्राकृतिक रसायनों को समझा जा रहा है।

यह विज्ञान बताता है कि पौधे सूखा, अधिक तापमान, लवणीयता और रोगों जैसे तनावों का सामना कैसे करते हैं। इसी समझ के आधार पर ऐसी तकनीक विकसित की जा रही है, जिससे फसलें संकट आने से पहले ही मजबूत बन सकें।

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संस्थान के निदेशक डा. राजेश कुमार बताते हैं कि आज किसान कई मोर्चों पर जूझ रहा है। मिट्टी की उर्वरता घट रही है, मौसम का मिजाज अनिश्चित हो गया है और खाद व कीटनाशकों की लागत लगातार बढ़ रही है।

ऐसे में खेती को टिकाऊ बनाने के लिए प्रकृति आधारित समाधान जरूरी हैं। मेटाबोलोमिक्स के माध्यम से यह जाना जा रहा है कि तनाव की स्थिति में पौधे फेनोलिक्स, फ्लेवोनोइड्स, अमीनो एसिड, फाइटोहार्मोन और विटामिन जैसे उपयोगी यौगिक कैसे बनाते हैं। इन्हीं के आधार पर जैव उत्तेजक तैयार किए जा रहे हैं, जो फसलों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं और पैदावार को सुरक्षित रखते हैं।

जैव प्रौद्योगिकी के प्रधान विज्ञानी डॉ. डीपी सिंह बताते हैं कि मिट्टी के भीतर मौजूद सूक्ष्मजीव खेती के असली नायक हैं। ये सूक्ष्मजीव पौधों को पोषण देने के साथ उन्हें रोगों से बचाने में भी मदद करते हैं।

मल्टीओमिक्स की सहायता से यह पहचाना जा रहा है कि एजोटोबैक्टर, बैसिलस और प्सीयुडोमोनास जैसे जीवाणु किन परिस्थितियों में सबसे अधिक प्रभावी होते हैं। अब इन्हें अकेले नहीं, बल्कि संतुलित मिश्रण के रूप में प्रयोग किया जा रहा है।

इन मिश्रित जीवाणु अनुकल्पों, जैसे बीसी-6 और एजोबीसी, के प्रयोग से रासायनिक उर्वरकों की खपत 25 से 30 प्रतिशत तक घटाने में सफलता मिली है।

इससे न केवल लागत कम हो रही है, बल्कि वर्षों से रसायनों के कारण कमजोर हुई मिट्टी भी धीरे-धीरे स्वस्थ हो रही है। यह बदलाव खेती को फिर से प्रकृति के करीब ला रहा है।

इस पूरी प्रक्रिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआइ की भूमिका भी अहम है। लाखों शोध आंकड़ों का विश्लेषण कर एआइ की मदद से हर क्षेत्र की स्थानीय मिट्टी, जलवायु और फसल की जरूरत के अनुसार अलग-अलग जैव-फार्मूले तैयार किए जा रहे हैं। यानी अब खेती में ‘एक ही समाधान सबके लिए’ की सोच टूट रही है और हर किसान के लिए व्यक्तिगत समाधान संभव हो रहा है।
इसका सीधा लाभ किसान की आय, उपभोक्ता के स्वास्थ्य और देश की अर्थव्यवस्था को मिलेगा। कम रसायन, कम लागत और बेहतर गुणवत्ता से किसान समृद्ध होंगे, लोगों को सुरक्षित और पौष्टिक सब्जियां मिलेंगी और समाज स्वस्थ बनेगा।


यह नया विज्ञान जैविक उत्पादों पर भरोसा बढ़ाएगा और खेती को व्यावहारिक, समावेशी और टिकाऊ बनाएगा। भारत की खेती अब सिर्फ उत्पादन की दौड़ में नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर विकास की राह पर आगे बढ़ रही है। इसमें विज्ञान प्रकृति साथ मिलकर किसानों को सशक्त बना रहे हैं। -डॉ. राजेश कुमार, निदेशक, भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी।
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