deltin55 Publish time 2026-1-19 09:42:40

ICMR बना रहा बच्चों के लिए इंडियन हेल्थ स्टैंडर्ड्स, विदेशी पैरामीटर्स से क्या है फर्क, भारतीय मानक क्यों ज़रूरी



       
               
       
भारत में बच्चों और किशोरों ( 0 से 18 साल) के लिए अब इंडियन हेल्थ स्टैंडर्ड्स बनेंगे. विदेशी पैरामीटर के हिसाब से देश के बच्चों का इलाज नहीं होगा. अलग- अलग बीमारियों की जांच रिपोर्ट देखने के बाद डॉक्टर भारतीय मानकों के हिसाब से ही इलाज की दिशा तय कर सकेंगे. इस दिशा में आईसीएमआर काम कर रहा है. इसके लिए देश के बड़े बड़े अस्पतालों से डाटा लिया जा रहा है. इसका मकसद है भारतीय बच्चों के शरीर, खानपान, जेनेटिक्स के हिसाब से सही और सटीक जांच के साथ ट्रीटमेंट करना है.


अभी तक इलाज के लिए विदेशी पैरामीटर का यूज किया जाता है. लेकिन ये मानक विदेशी आबादी (यूरोप, अमेरिका) के डेटा पर आधारित होते हैं. जबकि भारत में बच्चों की बीमारियां, पोषण के साधन और लाइफस्टाइल सब कुछ अलग ही है. लेकिन फिर भी उनके ट्रीटमेंट के प्रोटोकॉल से ही भारत में भी इलाज होता है. इसका कारण यह है कि आजतक भारतीय हेल्थ स्टैंडर्ड्स नहीं बने हैं, लेकिन अब आईसीएमआर ने इनको बनाने की कवायद शुरू कर दी है.



हीमोग्लोबिन (Hb)

      

ग्रोथ चार्ट


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ब्लड शुगर


लिपिड प्रोफाइल


थायरॉइड फंक्शन टेस्ट


बीएमआई (BMI)



इस बारे में गाजियाबाद के जिला अस्पताल में पीडियाट्रिक विभाग में डॉ विपिनचंद्र उपाध्याय बताते हैं कि विदेशों में बच्चों का औसत कद, वजन, डाइट भारतीय बच्चों से अलग होता है, लेकिन यहां हीमोग्लोबिन के लेवल से लेकर ग्रोथ चार्ट के सभी पैमाने विदेशी ही हैं. उदाहरण के तौर पर अलग भारत में किसी 09 साल के बच्चे का हीमोग्लोबिन 12 से कम है तो विदेशी पैरामीटर के हिसाब से यह सही नहीं है, लेकिन हो सकता है कि अगर भारतीय मानक बन जाएं तो ये 12 तक भी ठीक हो. क्योंकि विदेशों की तुलना में यहां चीजें अलग हैं.


जैसे वहां ग्रोथ चार्ट में 8 साल के बच्चे का कम के कम 28 किलो वजन होना चाहिए. लेकिन जरूरी नहीं है कि भारत में भी ऐसा ही हो, लेकिन हमको विदेशी पैरामीटर के हिसाब से चलना होता है. अगर बच्चे का वजन इतना नहीं है तो उसको अंडरवेट मानकर इलाज करना होता है. लेकिन अगर नए पैरामीटर बनते हैं तो जरूरी नहीं है कि इस रेंज में अगर कोई बच्चा है तो वह अंडरवेट ही होगा.


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