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Basant Panchami 2026: कब और क्यों मनाई जाती है वसंत पंचमी? यहां पढ़ें धार्मिक महत्व

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Basant Panchami 2026: वसंत पंचमी का धार्मिक महत्व



डा. प्रणव पण्ड्या (कुलाधिपति, देवसंस्कृति विश्वविद्यालय)। वसंत पंचमी ऐसा ही एक पर्व है, जो जीवन में नवसृजन, पवित्रता और प्रज्ञा के अवतरण का संदेश देता है। यह ऋतु परिवर्तन का उत्सव ही नहीं, मानव अंतःकरण में सरस्वती तत्व के जागरण का महापर्व है।

यह पर्व सरस्वती पूजन का अवसर देता है। माता सरस्वती को विद्या की देवी कहा गया है, किंतु भारतीय ऋषि परंपरा में विद्या का अर्थ केवल जानकारी या शास्त्रज्ञान नहीं है। विद्या वह शक्ति है, जो मनुष्य को विवेकशील, संवेदनशील और उत्तरदायी बनाती है। इस दृष्टि से माता सरस्वती केवल पढ़ने-लिखने की अधिष्ठात्री ही नहीं, बल्कि वाणी, विचार और आचरण की शुद्धि की दिव्य प्रेरणा हैं।

वसंत ऋतु स्वयं सरस्वती तत्व की प्रतीक है। जैसे शीत की जड़ता टूटकर जीवन में नवचेतना का संचार होता है, वैसे ही माता सरस्वती उपासना आराधना मनुष्य के भीतर जमी हुई अज्ञान, प्रमाद और नकारात्मकता को हटाकर प्रज्ञा का संचार करती है। पीले पुष्प, हरित खेत और कोमल वातावरण हमें यह स्मरण कराते हैं कि जीवन का मूल स्वभाव विकास और सौंदर्य है।

आज का युग विज्ञान का युग है। तकनीक और सूचना की कोई कमी नहीं, फिर भी समाज में असंतुलन, हिंसा और दिशाहीनता बढ़ती जा रही है। इसका कारण ज्ञान का अभाव नहीं, बल्कि संस्कारयुक्त विद्या का अभाव है। युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने स्पष्ट कहा है कि - “जिस शिक्षा से मनुष्य श्रेष्ठ न बने, वह वास्तविक शिक्षा नहीं है।” सरस्वती पूजन और वसंत पंचमी इसी विकृति के समाधान का पर्व है, जहां हम ज्ञान को चरित्र और सेवा से जोड़ने का संकल्प लेते हैं।

माता सरस्वती का प्रतीकात्मक स्वरूप इस संदेश को स्पष्ट करता है कि उनका श्वेत वस्त्र पवित्रता और निष्कलंकता का प्रतीक है। यह बताता है कि सच्चा ज्ञान अहंकार से मुक्त होता है। वीणा संतुलन का संकेत देती है। विचार और कर्म, अध्ययन और आचरण का संतुलन है। उनका वाहन हंस विवेक का प्रतीक है, दूध और पानी को अलग करने की क्षमता, अर्थात् सत्य और असत्य का भेद।

गायत्री परिवार की दृष्टि में सरस्वती उपासना, गायत्री साधना का ही विस्तार है। गायत्री मंत्र का पद “धियो यो नः प्रचोदयात्” बुद्धि के परिष्कार की प्रार्थना है। जब बुद्धि शुद्ध होती है, तभी सरस्वती का ज्ञान लोकमंगलकारी बनता है। इसीलिए कहा गया है कि गायत्री बुद्धि को गढ़ती हैं और सरस्वती उसे आलोकित करती हैं।

बसंत पंचमी पर सरस्वती पूजन का वास्तविक अर्थ पुस्तकों और कलम की पूजा तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक भाव है विचारों की पवित्रता, वाणी का संयम, आचरण की मर्यादा और प्रतिभा का समाज के लिए समर्पण।

युगऋषि पं श्रीराम शर्मा आचार्यश्री और माता भगवती देवी शर्मा जी कहते हैं कि “जो सीखा है, उसे जियो; और जो जिया है, उसे बांटो।” आज का युवा वर्ग इस पर्व का केंद्रबिंदु है। वही युग परिवर्तन की धुरी है। यदि उसकी बुद्धि संस्कारित हुई, तो वही युवा समाज को नई दिशा देगा।

सरस्वती पूजा और वसंत पंचमी युवाओं को यह प्रेरणा देती है कि वे केवल सफल नहीं, बल्कि सार्थक जीवन जिएं। जब सरस्वती उपासना जीवन-शैली बनेगी, तभी ज्ञान, करुणा और सेवा से युक्त समाज का निर्माण संभव होगा।

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