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Saraswati Puja: 23 जनवरी को मनाई जाएगी बसंत पंचमी, जानिए शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

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बसंत पंचमी 23 जनवरी को मनाया जाएगा। फाइल फोटो



जागरण संवाददाता, जमशेदपुर। Basant panchami 2026 के स्वागत और विद्या की देवी मां सरस्वती की आराधना का महापर्व बसंत पंचमी 23 जनवरी 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस वर्ष पूजा के लिए सुबह 7:37 बजे का समय अत्यंत शुभ है, हालांकि भक्त अपनी श्रद्धा और सुविधानुसार सुबह से लेकर दोपहर तक कभी भी मां शारदा का पूजन कर सकते हैं।

इस दिन केवल वीणावादिनी की ही नहीं, बल्कि रति-कामदेव और लेखनी (कलम) की पूजा का भी विधान है। लौहनगरी जमशेदपुर में इस पर्व को लेकर गजब का उत्साह है।

छोटा गोविंदपुर स्थित श्रीराम मंदिर के पुरोहित देवानंद पांडेय ने पर्व की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि माघ शुक्ल पंचमी को ब्रह्मांड में ज्ञान और नाद (ध्वनि) का संचार हुआ था। शुक्रवार को सुबह 7:37 बजे से पूजन का विशेष योग बन रहा है।

विद्यार्थियों और कला प्रेमियों के लिए यह समय साधना शुरू करने के लिए सर्वोत्तम है। पुरोहित देवानंद के अनुसार, बसंत पंचमी को अबूझ मुहूर्त भी माना जाता है, यानी इस दिन बिना पंचांग देखे कोई भी शुभ कार्य, जैसे गृह प्रवेश या विवाह आदि किया जा सकता है।
रतिकाम महोत्सव और मदन पंचमी

पुरोहित देवानंद पांडेय बताते हैं कि बसंत पंचमी केवल विद्या का ही नहीं, बल्कि प्रेम और सृजन का भी उत्सव है। शास्त्रों में इसे मदन पंचमी भी कहा गया है। इस दिन कामदेव और उनकी पत्नी रति की पूजा की जाती है, जिसे रतिकाम महोत्सव के नाम से जाना जाता है।

यह पूजा दांपत्य जीवन में प्रेम और प्रकृति में नवनिर्माण का प्रतीक है। बसंत के आगमन के साथ ही प्रकृति का श्रृंगार पूर्ण होता है, इसलिए यह दिन श्रृंगार रस और उल्लास का भी है।
लेखनी पूजा : अक्षर ज्ञान की शुरुआत

बंगाली समाज और शिक्षण संस्थानों में इस दिन लेखनी पूजा या दावात-कलम पूजा की अनूठी परंपरा है। पुरोहित ने बताया कि इस दिन मां सरस्वती के चरणों में कलम, दवात और पुस्तकें अर्पित की जाती हैं।

बंगाली परिवारों में छोटे बच्चों को इसी दिन पहली बार पट्टी-पेंसिल पकड़ाकर अक्षर ज्ञान (हाथे-खड़ी) कराया जाता है। मान्यता है कि इस दिन लेखनी पूजने से वर्ष भर बुद्धि कुशाग्र रहती है और वाणी में मधुरता आती है।
शहर में बसंती बयार

शहर के गली-मोहल्लों में पूजा की तैयारियां उफान पर हैं। साकची, बिष्टुपुर, टेल्को से लेकर सोनारी तक, हर जगह छोटे-बड़े पंडालों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। मूर्तिकारों के पास प्रतिमा ले जाने के लिए समितियों की भीड़ जुटने लगी है। शिक्षण संस्थानों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रिहर्सल चल रही है। पीली सरसों के फूलों की तरह शहर भी पीली रोशनी और सजावट से नहाने को तैयार है।

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