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Mithila Culture: भारतीय परंपरा में होते हैं विभिन्न प्रकार के 'अरिपन', जानें किन अवसरों पर कैसे अरिपन बनाने का है महत्व

   
Aripan Importance in Mithila culture: अरिपन का महत्व मिथिला की लोक संस्कृति से जुड़ा हुआ है. खासकर शुभ-मांगलिक कार्यों में अरिपन बनाए जाते हैं. चावल के आटे में पानी मिलाकर अरिपन बनाया जाता है और इसमें रंग भरने के लिए हल्दी और सिंदूर का प्रयोग किया जाता है. यह भारतीय प्राचीन परंपरा का अंग है, जिसका उल्लेख प्राचीन पुस्तकों में भी मिलता है.

अरिपन मिथिला कला का एक प्रकार है, जोकि खासकर बिहार के मिथिला क्षेत्र से उत्पन्न हुई. मिथिला में आंगन, फर्श और दीवारों पर चित्रकारी या अरिपन बनाने की परंपरा काफी पुरानी है. अलग-अलग उत्सव और त्योहारों में विभिन्न तरह के अरिपन बनाए जाते हैं.

वेद-पुराणों में मिलता है अरिपन उल्लेख

भले ही वर्तमान समय में अरिपन बनाने की कला से महिलाएं दूर होती जा रही हैं, लेकिन नए-नए कला, रंग और आकार के साथ आज भी कई मौकों पर अरिपन बनाए जाते हैं. इनमें स्वास्तिक अरिपन की परंपरा वैदिक काल से मानी जाती है. अरिपन वेद में सर्वतोभद्र नाम से आया है.

पौराणिक समय में 41 स्वास्तिक को आपस में जोड़कर अरिपन बनाए जाते थे. इसमें भगवान विष्णु के चार भुजाओं को रेखांकित किया जाता था. गरुड़ पुराण में तुलसी के पास अरिपन बनाए जाने का उल्लेख मिलता है. इसके अनुसार तुलसी के पौधे से निकलने वाले स्वास्थ्यवर्धक वायु के कारण इसे तुलसी के नीचे बनाया जाता है. आज भी तुलसी के पास अरिपन बनाए जाते हैं.

अरिपन के प्रकार (Types of Aripan)

अरिपन कई प्रकार के होते हैं, जिन्हें विभिन्न अवसरों पर अलग-अलग तरह से तैयार किया जाता है. जैसे—

छटीयार पूजा (नवजात के जन्म के छठे दिन होने वाली पूदा), मुंडन, कर्ण छेदन यानी कान छेदना, यज्ञोपवीत संस्कार (जनेऊ संस्कार),विवाह और द्वादश (मृत्यु उपरांत) के लिए अलग-अलग अरिपन बनाए जाते हैं.
तुसारी अरिपन- तुसारी पूजा के शुभ मौके पर यह अरिपन बनाया जाता है, जोकि मकर संक्रांति और फाल्गुन संक्रांति में होता है. युवा व कुंवारी मैथिली लड़कियां अच्छे वर की कामना के लिए तुसारी पूजा करती हैं और तुसारी का अरिपन बनाती हैं. इसमें एक मंदिर, चंद्रमा, सूर्य और नवग्रह बनाए जाते हैं और दिशाओं को भी दर्शाया जाता है. सांझ अरिपन- यह अरिपन संध्या देवी (शाम की देवी) के सम्मान में बनाया जाता है. सष्टि अरिपन- जब कुंवारी लड़कियां युवावस्था प्राप्त कर लेती है तो सष्टि पूजन होता है, जिसमें यह अरिपन बनाया जाता है और देवी षष्ठी की पूजा की जाती है. कोजागरा अरिपन- इसे मखाना के पत्ते पर आश्विन माह की पूर्णिमा के दिन बनाने की परंपरा है. नवविवाहित वर के घर पर यह अरिपन बनाया जाता है और फिर चुमावन की रस्म होती है. दीपावली अरिपन- दीपावली पर आमतौर पर हर जगह रंगोली बनाई जाती है. लेकिन मिथिला क्षेत्र में इसे सुख-रत्न अरिपन के रूप में जाना जाता है. इसे घर पर देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए बनाया जाता है. स्वस्तिक अरिपन – यह सबसे पुराना अरिपन है. युवा पीढ़ी को आशीर्वाद देने के लिए इसे तैयार किया जाता है और हर शुभ अवसर पर इसे बनाया जाता है. पंचदल अरिपन - यह शक्ति पूजा में बनाया जाता है. इसमे पांच पंखुड़ियों वाले कमल को बनाया जाता है. सप्तदल अरिपन- सात पंखुड़ियों वाले कमल वाला ये अरिपन सप्तऋषियों को समर्पित होता है. अष्टदल अरिपन - देव पूजा, सत्यनारायण भगवान विष्णु की पूजा एवं देवोत्थान एकादशी की पूजा में अष्टदल अरिपन बनाया जाता है. इसमें कमल की आठ पंखुड़ियां अष्ट भुजाधारी विष्णु का प्रतीक होता है. इसके अलावा अरिपन मेंमनुष्य, पक्षी, जानवर, पेड़-पत्ते, फूल, तांत्रिक प्रतीक, यंत्र, नवग्रह, सूर्य-चंद्रमा, देवी-देवता, दीप, नदी-पर्वत आदि जैसे छवियां बनाई जाती है.
भारतीय परंपरा में अरिपन या रंगोली का महत्व

अरिपन (बिहार)- यह बिहार के मिथिली की लोक चित्र कला है जोकि आंगन में बनाई जाती है और इसे ‘अरिपन’ कहा जाता है.

मांडना (राजस्थान)- राजस्थान की लोक कला या चित्रकला को मांडना कहते हैं. इसे त्योहारों और मुख्य उत्सवों पर जमीन और दीवारों पर बनाया जाता है.

अल्पना (बंगाल)- बंगाल में अरिपन या रंगोली ‘अल्पना’ नाम से प्रचलित है.

ऐपण (उत्तराखंड)- ऐपण कुमाऊं में होने वाली रंगोली है, जोकि उत्तराखंड राज्य में प्रचलित है. इसे पूजाघर, प्रवेश द्वार और दीवारों पर बनाया जाता है.

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झोटी और चिता (उड़ीसा)- झोटी या चिता परंपरागत उड़िया कला है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में लोकप्रिय है.

कोलम (केरल)- केरल में रंगोली को कोलम कहते हैं. इसे शुभ अवसरों पर बनाया जाता है. खासकर ओणम पर्व के दौरान इसे बनाया जाता है.

मुग्गु (आंध्र प्रदेश)- आंध्र प्रदेश में बनाए जाने वाले अरिपन को मुग्गु कहते हैं.

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