अपने फायदे के लिए भारत का भी नुकसान कर रहा चीन, ड्रैगन की डंपिंग नीति क्यों बनी जी का जंजाल?
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नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ के बाद से चीन की हालत काफी कमजोर दिखाई दे रही है। चीन अपने सामान को अमेरिका में बेच नहीं पा रहा है। ऐसे में वह भारत समेत दूसरे देशों का सहारा ले रहा है। चीन का ट्रेड सरप्लस पिछले साल रेकॉर्ड 1.2 ट्रिलियन डॉलर रहा है। चीन ने अपना एक्सपोर्ट बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं। ड्रैगन ने इसके लिए अपनी करेंसी युआन को भी कमजोर कर दिया। साथ कई चीजों की कीमतें भी कम कर दी हैं। चीन की इस रणनीति से भारत दूसरे देशों को नुकसान हो रहा है।अमेरिका से होड़ के कारण चीन अपना सस्ता सामान कई देशों में डंप कर रहा है। चीन का मकसद है अपने सामानों की बिक्री के लिए अमेरिकी बाजार पर निर्भरता घटाना और दूसरे मार्केट में जगह बनाना। इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा। चीन की इस डंपिंग नीति के कारण भारत पर भी काफी असर पड़ा है। देश की GDP में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी घटकर लगभग 14% रह गई है। भारत ने चीन से होने वाले डंपिंग की जांच के बाद केमिकल्स, इलेक्ट्रिकल स्टील्स समेत कुछ उद्योगों में कड़े शुल्क लगा दिए हैं।दूसरे देशों ने भी चीन की रणनीति के खिलाफ जवाबी शुल्क का रास्ता अपनाया है। डंपिंग को लेकर 120 से अधिक व्यापार जांच चल रही हैं। जापान, कनाडा, मेक्सिको और थाईलैंड ने टैरिफ लगाना शुरू किया है। चीन की इस रणनीति से उसके प्रतिस्पर्धी देशों - फ्रांस, जर्मनी और जापान को नुकसान उठाना पड़ रहा है। पूर्वी यूरोप और अफ्रीका को भी सस्ते चीनी आइटम से होड़ मुश्किल हो रही।यूरोप में चीन पेंट, प्लास्टिक, पेपर, टेक और ऑटो इंडस्ट्री में इस्तेमाल होने वाली चीजें डंप कर रहा है। इसके लिए यूरोपीय संघ अब 〷ड इन यूरोप✩ैसे नियमों पर विचार कर रहा। चीन की डंपिंग नीति के कारण यूरोप में भारत भी फंस गया है। यूरोपीय संघ (EU) ने चीन और भारत से आने वाले बेरियम कार्बोनेट पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगा दी है। कुछ चीनी कंपनियों के लिए यह ड्यूटी 83.9% तक और भारतीय सप्लायर्स के लिए 4.6% तक है। इससे कांच, सिरेमिक और दूसरे उद्योगों के बाजारों में हलचल मच गई है।
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