Basant Panchami 2026: वो देवता, जिससे जुड़ा है वसंत पंचमी का नाता, क्यों चढ़ाते हैं इनको भोग-तिलक
https://www.jagranimages.com/images/2026/01/20/article/image/Basant-Panchami-1768894561847.webpवसंत पंचमी पर इस देवता को चढ़ाते हैं भोग-तिलक (Image Source: AI-Generated)
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। आमतौर पर वसंत पंचमी का नाम आते ही हमारे मन में पीले वस्त्र, चारों तरफ खिली सरसों और विद्या की देवी मां सरस्वती की तस्वीर उभरती है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि इसी दिन से महादेव के विवाह की रस्में भी शुरू हो जाती हैं? जी हां, धर्म और आस्था की नगरी काशी समेत कई हिस्सों में वसंत पंचमी का त्योहार भगवान शिव शिव के \“तिलक\“ उत्सव के रूप में मनाया जाता है। आइए जानते हैं इस खास परंपरा और इसके पीछे की धार्मिक मान्यताएं क्या हैं।
महाशिवरात्रि की दस्तक और महादेव का तिलक
शादी-ब्याह की रस्मों में \“तिलक\“ का बहुत महत्व होता है। पौराणिक ग्रंथों और शिव पुराण के प्रसंगों की ओर रुख करें, तो महाशिवरात्रि पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। ठीक उसी तरह, जैसे आम शादियों में विवाह से कुछ दिन पहले तिलक चढ़ाया जाता है, वसंत पंचमी के दिन महादेव का तिलक उत्सव मनाया जाता है।
धर्म नगरी काशी (वाराणसी) में तो यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। वहां के बुजुर्ग और विद्वान बताते हैं कि इस दिन भक्त अपने आराध्य शिव को दूल्हे की तरह सजाते हैं। उन्हें चंदन, हल्दी और गुलाल अर्पित किया जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि अब वैरागी शिव \“दूल्हा\“ बनने की तैयारी में हैं और ब्रह्मांड के सबसे बड़े विवाह का काउंटडाउन शुरू हो गया है।
शिव को लगाते हैं मालपुए का भोग
इस दिन की एक और अनूठी रस्म है कि भगवान शिव को केसरिया मालपुए का भोग लगाया जाता है। स्थानीय मठों और मंदिरों की परंपराओं के मुताबिक, वसंत ऋतु के आगमन और महादेव के तिलक की खुशी में उन्हें मीठे मालपुए चढ़ाए जाते हैं।
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(Image Source: Freepik)
यह भोग न केवल श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि यह बदलते मौसम के साथ खान-पान में आने वाले बदलावों को भी दर्शाता है। कई क्षेत्रों में इसी दिन से \“होली\“ का डांडा भी गाड़ दिया जाता है, जो यह संकेत देता है कि अब फागुन की मस्ती और रंगों का त्योहार बस कुछ ही दिन दूर है।
इस पर्व का आध्यात्मिक महत्व क्या है?
वसंत पंचमी प्रकृति के श्रृंगार का पर्व है। इस दिन महादेव का तिलक करना यह दर्शाता है कि वैराग्य के देवता भी प्रकृति और प्रेम के उत्सव में शामिल होते हैं। यह परंपरा भक्तों को आनंद और उल्लास से भर देती है और उन्हें आने वाली महाशिवरात्रि के महापर्व के लिए मानसिक रूप से तैयार करती है।
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