भारत में पैसा लगा सकता है चीन, अर्थव्यवस्था को मिलेगा बूस्ट, सरकार भी पॉलिसी में बदलाव पर कर रही मंथन!
भारत सरकार 2020 के बाद चीन को लेकर लागू किए गए विदेशी निवेश और सरकारी खरीद के सख्त नियमों पर दोबारा विचार कर रही है। सरकार का फोकस अब निवेशक किस देश का है, इससे ज्यादा इस बात पर है कि निवेश से देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार और घरेलू प्रोडक्शन क्षमता को कितना फायदा होता है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, सिस्टम के भीतर इस बात पर सहमति बन रही है कि जो निवेश रोजगार पैदा करता है और तकनीक लाता है, उसे बढ़ावा दिया जाना चाहिए। हालांकि, टेलीकॉम, डिफेंस और रणनीतिक ढांचे जैसे संवेदनशील सेक्टर में सख्ती बरकरार रहेगी।एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने Moneycontrol से कहा, “नीतियों को भारत के विकास लक्ष्यों के अनुरूप होना चाहिए। जो निवेश रोजगार और तकनीक लाता है, उसे निवेशक की पहचान से अलग देखकर परखा जाना चाहिए।”
प्रेस नोट 3 में बदलाव की संभावना
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अप्रैल 2020 में लागू किया गया प्रेस नोट 3, भारत से जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) के लिए पहले से सरकारी मंजूरी अनिवार्य करता है। यह नियम उस समय भू-राजनीतिक तनाव और भारतीय कंपनियों के सस्ते अधिग्रहण को रोकने के लिए लाया गया था।
अब सरकार उन क्षेत्रों में नियमों में ढील पर विचार कर रही है, जहां विदेशी पूंजी से घरेलू उद्योग को फायदा हो सकता है। सरकारी सूत्रों ने साफ किया कि सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा, लेकिन रिन्यूएबल एनर्जी और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर में संतुलित तरीके से निवेश के रास्ते खोले जा सकते हैं।
सरकारी खरीद नियमों में भी राहत संभव
2020 के बाद सरकारी ठेकों में चीन की कंपनियों की भागीदारी पर लगाए गए प्रतिबंधों में भी कुछ राहत दी जा सकती है। सूत्रों के मुताबिक, इससे रुके हुए प्रोजेक्ट को रफ्तार मिलने और कारोबारी संबंधों को सुधारने में मदद मिल सकती है।
आर्थिक वजहों पर जोर
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि अगर कोई प्रोडक्ट भारत में बनाया जा सकता है, लेकिन मजबूरी में आयात करना पड़े, तो इससे रोजगार के अवसर गंवाए जाते हैं। साथ ही यह भी माना जा रहा है कि पूंजी अक्सर तीसरे देशों के जरिए भारत पहुंच जाती है, जिससे सिर्फ राष्ट्रीयता के आधार पर प्रतिबंध कम असरदार हो जाते हैं।
सुरक्षा के साथ संतुलन
सरकार ने साफ किया है कि किसी भी तरह की ढील चुनिंदा सेक्टर में और राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ही दी जाएगी। डेटा सुरक्षा, अहम तकनीक और रणनीतिक क्षेत्रों पर कड़ी निगरानी जारी रहेगी।
फिलहाल इस प्रस्ताव पर अलग-अलग मंत्रालयों और उद्योग संगठनों से बातचीत चल रही है।
उद्योग जगत की मांग: सेक्टर के हिसाब से राहत
उद्योग जगत का कहना है कि चीन से जुड़े प्रतिबंधों में ढील अगर दी जाए, तो वो चुनिंदा क्षेत्रों तक सीमित होनी चाहिए।
CTA Apparels के चेयरमैन मुकेश कंसल के अनुसार, टेक्सटाइल और परिधान उद्योग में भारत की चीन पर निर्भरता मुख्य रूप से कच्चे माल के लिए है।
उन्होंने कहा कि मैन-मेड फाइबर, विशेष धागे, रंग, केमिकल, एक्सेसरी और टेक्सटाइल मशीनरी के मामले में चीन की बड़ी भूमिका है। प्रतिबंधों के बाद इनपुट लागत बढ़ी है और सप्लाई में अनिश्चितता आई है, जिससे भारत के ग्लोबल कंपटीशन पर असर पड़ा है।
तकनीक और मशीनरी की कमी से नुकसान
उद्योग का कहना है कि एडवांस प्रोसेसिंग, डाइंग और फिनिशिंग तकनीक तक देर से पहुंच और मशीनरी की कमी के कारण प्रोडक्शन क्षमता बढ़ाने में दिक्कतें आई हैं। इंडस्ट्री पूरी तरह से प्रतिबंध हटाने के पक्ष में नहीं है, बल्कि वो सेक्टर आधारित, नियंत्रित राहत की मांग कर रही है।
इंजीनियरिंग सेक्टर की भी चिंता
इंजीनियरिंग इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों ने बताया कि कई क्षेत्रों में भारत अभी भी चीन से आने वाली मशीनरी और पार्ट्स पर निर्भर है।
अप्रैल से अक्टूबर 2025-26 के दौरान चीन से इंजीनियरिंग प्रोडक्ट का आयात 12.6 प्रतिशत बढ़कर 24.03 अरब डॉलर पहुंच गया।
सबसे ज्यादा निर्भरता इंडस्ट्रियल मशीनरी पर है, जिसका इस्तेमाल कृषि, डेयरी, फूड प्रोसेसिंग और टेक्सटाइल उद्योग में होता है। इसके अलावा इलेक्ट्रिकल मशीनरी, एल्यूमिनियम, स्टील प्रोडक्ट, ऑटो पार्ट्स और एसी-रेफ्रिजरेशन उपकरण भी शामिल हैं।
हाई-टेक सेक्टर पर असर
उद्योग का कहना है कि चीन के निर्यात नियंत्रण नियमों और निवेश प्रतिबंधों के चलते रेयर अर्थ मिनरल, बैटरी तकनीक और उन्नत मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े कच्चे माल तक पहुंच मुश्किल हो गई है। इससे लागत बढ़ी है और उत्पादन विस्तार में देरी हो रही है।
उद्योग ने सरकार से अपील की है कि इन मुद्दों को सुलझाने के लिए सरकारी स्तर पर बातचीत की जाए, ताकि जरूरी कच्चे माल की सप्लाई सुचारु हो सके।
उद्योग सूत्रों का कहना है कि अगर मौजूदा प्रतिबंध और चीन के निर्यात नियंत्रण लंबे समय तक जारी रहे, तो इससे भारत की मैन्युफैक्चरिंग प्रतिस्पर्धा और स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों पर असर पड़ सकता है।
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