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आखिर क्यों डॉ. मनमोहन सिंह उदारीकरण का पर्याय बने? उस नीति ने कैसे बदली भारतीय अर्थव्यवस्था?


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पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे। देश के लोग उन्हें विभिन्न तरीकों से श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। कुछ उनकी राजनीति पर बात कर रहे हैं, तो कुछ उनकी सादगी को याद कर रहे हैं, लेकिन एक बात है जिस पर सब बोल रहे हैं, वह है उनका देश की अर्थव्यवस्था में योगदान। हर कोई उन्हें 1991 से जोड़ रहा है, तब किए गए आर्थिक सुधारों से जोड़ रहा है। ऐसा लगता है जैसे यह साल डॉ. मनमोहन सिंह के लिए और उनके योगदान के लिए एक प्रतीक बन चुका है। यह साल था भी ऐसा, जो डॉ. सिंह को हमेशा जीवंत बनाए रखेगा। यह साल भारत के लिए एक नए युग की शुरुआत थी, एक ऐसा मोड़, जिसने देश को बदलकर रख दिया।सन 1991 का आर्थिक संकट भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। यह संकट मुख्य रूप से विदेशी मुद्रा भंडार की कमी, व्यापार घाटे और राजकोषीय घाटे के कारण उत्पन्न हुआ। हालांकि, इसकी शुरुआत 1980 के दशक के अंत में ही हो गई थी, जब भारत की अर्थव्यवस्था आयात-आधारित हो गई और निर्यात में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाई। बढ़ते ऋण और ब्याज भुगतान ने आर्थिक दबाव को और बढ़ाया। इसके अलावा, खाड़ी युद्ध और तेल की कीमतों में उछाल ने स्थिति को जटिल बना दिया। विदेशी मुद्रा भंडार केवल दो सप्ताह के आयात के लिए बचा था, जिसके कारण सरकार को IMF से आपातकालीन ऋण लेने के लिए स्वर्ण भंडार गिरवी रखना पड़ा।इस बीच, राजीव गांधी की मृत्यु के बाद पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में नई सरकार बनी। वित्त मंत्री पद के कई दावेदार थे, तब डॉ. मनमोहन सिंह का नाम कहीं दूर-दूर तक नहीं था। फिर भी, नियति ने इस साल और मनमोहन सिंह दोनों को भारत में बड़े बदलाव के लिए चुन लिया था। डॉ. सिंह यूजीसी चेयरमैन के रूप में अपने कार्यालय में थे, जब एक कॉल ने उन्हें वित्त मंत्री बनने का प्रस्ताव दिया। इसके बाद ही 1991 के आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई।1991 के आर्थिक सुधारों का मुख्य उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था को संकट से उबारकर उसे एक मुक्त और प्रतिस्पर्धी प्रणाली में बदलना था। ये सुधार उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) के सिद्धांतों पर आधारित थे। उदारीकरण के तहत लाइसेंस राज को समाप्त कर दिया गया, जिससे उद्योगों और व्यवसायों के लिए सरकारी मंजूरी की बाधाएं कम हो गईं और व्यापार करना सरल हुआ। निजीकरण के अंतर्गत सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का विनिवेश किया गया और निजी क्षेत्र को अधिक भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया गया। वैश्वीकरण के तहत विदेशी निवेश के नियमों को सरल बनाया गया और आयात-निर्यात नीतियों में ढील दी गई, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा मिला और भारतीय बाजार वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार हो गया। 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत में कई बड़े परिवर्तन देखने को मिले, जिन्होंने देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना को पूरी तरह बदल दिया। इन सुधारों ने भारत को एक मिश्रित अर्थव्यवस्था से एक बाजार-उन्मुख अर्थव्यवस्था में बदल दिया, जहां निजी क्षेत्र और वैश्विक निवेश की भूमिका बढ़ गई। आज जब भारतीय अर्थव्यवस्था की बड़ी उपलब्धियों की बात करते हैं, तो विश्लेषण करने पर स्पस्ट होता है कि ये सभी उपलब्धियां 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद ही संभव हो पाई हैं। वर्तमान में, भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी पहचान बना चुका है, लेकिन अगर हम जीडीपी के विस्तार को देखें, तो 1991 के बाद हुआ बदलाव निश्चित रूप से अद्वितीय है। 1951 से 1990 तक भारत के GDP में लगभग 786% का बदलाव हुआ था। 1951 में भारत की जीडीपी 30 बिलियन डॉलर थी, जो 1991 में बढ़कर 266 बिलियन डॉलर हो गई। इसके बाद हुए आर्थिक सुधारों का असर यह रहा कि महज 30 वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार बिलियन डॉलर से ट्रिलियन डॉलर में बदल गया। आज, 2023 में, भारत 3.7 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था है, जो कुल 1231.3% की वृद्धि को दर्शाता है। भारत को आज एक "सर्विस-ड्रिवेन इकॉनमी" के रूप में पहचाना जाता है, और इसका मुख्य कारण यह है कि भारतीय जीडीपी में सेवा क्षेत्र का योगदान लगातार बढ़ रहा है। वर्तमान में, भारत के जीडीपी में सेवा क्षेत्र का योगदान 50 प्रतिशत से अधिक है, जबकि 1991 में यह केवल 39.19% था। 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद, भारत ने सेवा निर्यात के क्षेत्र में अभूतपूर्व वृद्धि देखी है। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, 1991-92 में भारत के सेवा निर्यात का योगदान जीडीपी के केवल 4.05% के आसपास था। हालांकि, 2023 तक यह आंकड़ा बढ़कर 14.46% हो गया, जो भारत के सेवा क्षेत्र की उल्लेखनीय प्रगति को दर्शाता है। इसका प्रमुख कारण सूचना प्रौद्योगिकी और बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग (BPO) उद्योग का तेजी से विस्तार है। भारत ने सॉफ्टवेयर विकास, तकनीकी सेवाओं, और कस्टमर सपोर्ट सेवाओं के जरिए वैश्विक बाजार में अपनी पहचान बनाई। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और नोएडा जैसे शहरों ने आईटी और सेवा उद्योग के प्रमुख केंद्र के रूप में अपनी स्थिति मजबूत की है। 1990 के बाद दूरसंचार क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण बदलाव हुए। सरकारी एकाधिकार समाप्त होने और निजी कंपनियों के आगमन से प्रतिस्पर्धा बढ़ी, जिससे मोबाइल फोन और इंटरनेट सेवाएं व्यापक जनसंख्या तक पहुंची। इस बदलाव का असर ई-कॉमर्स, डिजिटल मार्केटिंग और ऑनलाइन सेवाओं पर भी पड़ा, जिससे रोजगार के नए अवसर उत्पन्न हुए। खुले बाजार की नीतियों ने इस विस्तार को और गति दी, जिससे मनोरंजन और मीडिया उद्योग में भी क्रांति आई। सैटेलाइट टीवी और केबल नेटवर्क से होते हुए, यह बदलाव अब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स तक पहुंच चुका है।1991 में भारत को विदेशी मुद्रा संकट का सामना करना पड़ा था, जब विदेशी मुद्रा भंडार केवल 1.2 बिलियन डॉलर था, जो महज तीन सप्ताह के आयात के लिए पर्याप्त था। यह स्थिति देश की आर्थिक स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बन गई थी। लेकिन आज, वही भारत विदेशी मुद्रा भंडार में अभूतपूर्व वृद्धि देखने को मिल रही है, और यह भंडार अब $655 बिलियन तक पहुँच चुका है। यह वृद्धि भारत की आर्थिक उदारीकरण और विकास की प्रक्रिया का परिणाम है।इस भंडार वृद्धि के कई महत्वपूर्ण चरण रहे हैं। सबसे पहले, 1991 से 1996 तक आर्थिक सुधारों के कारण निर्यात और पूंजी प्रवाह में वृद्धि हुई, जिसने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूती दी। इसके बाद, 2000 से 2010 के बीच आईटी और सेवा क्षेत्र में वैश्विक आउटसोर्सिंग की बढ़ती मांग ने भंडार में तेजी से वृद्धि की। अंततः, 2014 से 2023 तक एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश), एफआईआई (विदेशी संस्थागत निवेश) और रेमिटेंस के जरिए विदेशी मुद्रा भंडार में निरंतर वृद्धि होती रही, जिससे भारत की आर्थिक स्थिति और भी मजबूत हो गई है।1990 के बाद भारत में बड़े बदलाव हुए, विशेषकर शहरीकरण और मध्यवर्गीय वर्ग के विस्तार में। इन बदलावों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नया दृष्टिकोण और दिशा दी। 1991 में आर्थिक सुधारों के बाद उद्योगों में वृद्धि, नई सेवाओं का विस्तार और निजीकरण के कारण शहरीकरण को बल मिला। इन बदलावों ने नौकरियों के अवसर बढ़ाए, जिससे बड़े शहरों और महानगरों में सेवा क्षेत्र, आईटी, बैंकिंग, टेलीकॉम और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा हुए। इसके परिणामस्वरूप एक बड़ी आबादी शहरों की ओर पलायन करने लगी, और इसने मध्यवर्ग के विस्तार को गति दी। शहरी जीवन की आकर्षकता भी बढ़ी, क्योंकि सड़कें, मेट्रो, शहरी परिवहन और आवास क्षेत्र में विकास हुआ। 1991 में भारत की शहरी जनसंख्या लगभग 26% थी, जो 2011 में बढ़कर 31.2% हो गई। अनुमान के अनुसार, आज यह 35-40% तक पहुंच चुकी है। इसके अलावा, मध्यवर्ग का विस्तार भारत के लिए एक महत्वपूर्ण घटना रही है। 1990 के बाद हुए आर्थिक सुधारों ने एक बड़ा और मजबूत मध्यवर्ग विकसित किया। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 1991 में भारतीय मध्यवर्गीय जनसंख्या अपेक्षाकृत छोटी थी, जिसका अनुमान करीब 6.8 करोड़ था। लेकिन आज, 2023 में, भारतीय मध्यवर्ग का आकार बढ़कर कुल जनसंख्या का लगभग 31% हो चुका है, जो करीब 43.2 करोड़ लोगों के बराबर है। इस वृद्धि ने भारतीय बाजार की संरचना को बदल दिया और उपभोक्ता वस्त्रों, सेवाओं, और अन्य उत्पादों की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि की है।आज जो बड़े बदलाव हमें दिखाई देते हैं, उनके पीछे एक महत्वपूर्ण योगदान 1991 के आर्थिक सुधारों का है। इन सुधारों ने भारत को वैश्विक आर्थिक मंच पर स्थापित किया और हमारी आर्थिक ताकत को उजागर किया। उस समय भारत अपनी अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए दुनिया की ओर नहीं देख रहा था, बल्कि दुनिया भारत की ओर देख रही थी। आर्थिक सुधारों के बाद के दो दशकों में रोजगार के अवसर बढ़े, पूंजी निवेश में वृद्धि हुई, लोगों की आय में सुधार हुआ और बुनियादी ढांचे में भी उल्लेखनीय परिवर्तन आए। इन सुधारों ने भारत को एक नई दिशा दी और हमें एक नई आर्थिक शक्ति के रूप में वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई। यह सब संभव हुआ एक व्यक्ति के दूरदर्शी दृष्टिकोण से, जिसने 1991 के बजट भाषण में यह कहा था कि "कोई भी ताकत उस विचार को नहीं रोक सकती जिसका समय आ चुका है।"(लेखक राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, राउरकेला में शोधार्थी और फाइनेंस एंड इकोनॉमिक्स थिंक काउंसिल के संस्थापक एवं अध्यक्ष हैं)
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