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तीसरे विश्व युद्ध के लिए भारत तैयार: हाई टेक हथियारों से लैस होना जरूरी, रक्षा बजट में क्या होगा खास?

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रक्षा बजट में क्या होगा खास?



संजय मिश्र, नई दिल्ली। देश का 2026-27 का आम बजट ऐसे समय में आने जा रहा जब वर्तमान वैश्विक व्यवस्था वस्तुत: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे तीव्र अस्थिरता, अनिश्चितता ही नहीं बल्कि गंभीर सुरक्षा तथा सैन्य खतरों से रूबरू हो रही है।

उथल-पुथल के ऐसे दौर में भारत जैसे उभरती वैश्विक ताकत के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा केवल अपनी सीमाओं की सुरक्षा तक ही सीमित नहीं रह गई है।
वैश्विक अस्थिरता में भारत की बहुआयामी रक्षा चुनौतियां

पड़ोसी देशों के साथ जटिल संबंधों तथा लंबी समुद्री सीमाएं भारत की बढ़ती रक्षा जरूरतों को अपरिहार्य बना रही हैं। युद्ध के बदलते स्वरूप तथा तीव्र आधुनिक टेक्नोलॉजी पर आधारित हथियारों-उपकरणों ने देश की रक्षा चुनौतियां को बहुआयामी बना दिया है।

ऐसे में तात्कालिक रक्षा उपकरणों-हथियारों की खरीद तथा तकनीकी अपग्रेडेशन ही इन बहुआयामी चुनौतियों का समाधान नहीं है बल्कि आधुनिकीकरण के साथ सेनाओं को नए दौर के वारफेयर से लैस करना जरूरी हो गया है।

पारंपरिक से हाइब्रिड युद्ध के खतरे आपरेशन सिंदूर, अमेरिका का ईरान पर हमला या फिर रूस-यूक्रेन तथा गाजा में इजरायल-हमास के ताजा युद्धों ने साबित किया है कि अब निर्णायक जंग आकाश में ही लड़े जाएंगे।

चीन द्वारा सीमावर्ती क्षेत्रों में सैन्य बुनियादी ढांचे का तेजी से विकास, आधुनिक हथियारों की तैनाती और साइबर व अंतरिक्ष वार फेयर क्षमताओं में निवेश तो दूसरी ओर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और छदम युद्ध की रणनीति में अब ड्रोन-यूएवी तथा साइबर वार की चुनौतियां जटिलता बढ़ा रही हैं।

हिंद महासागर समेत समुद्री क्षेत्र में चीन की बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति, रणनीतिक बंदरगाहों में निवेश और समुद्री मार्गों पर आधिपत्य स्थापित करने की उसकी कोशिशें भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती के रूप में उभरी है।
सेनाओं को आधुनिक हथियारों और तकनीक से लैस करना अनिवार्य

ऐसे में साफ है कि सेना, नौसेना और वायुसेना को इन चुनौतियों के लिहाज से आधुनिक बनाए जाने की जरूरत है। आधुनिकीकरण और हथियारों का गैपभारत की सशस्त्र सेनाएं संख्या की दृष्टि से विश्व की सबसे बड़ी सेनाओं में शामिल हैं, लेकिन आधुनिक युद्ध की आवश्यकताओं के संदर्भ में कई स्तरों पर क्षमताओं का अंतर स्पष्ट दिखाई देता है।

थल सेना को आधुनिक एयर डिफेंस, उन्नत टैंक और नेटवर्क आधारित युद्ध प्रणालियों की आवश्यकता है। वायुसेना लंबे समय से लड़ाकू विमानों के बेड़े में कमी से जूझ रही है।

इस दिशा में 114 नए राफेल लड़ाकू जेट खरीदने की प्रक्रिया अब आगे बढ़ती दिख रही है। नौसेना के लिए जरूरी युद्धपोतों-पनडुब्बियों के निर्माण की परियोजनाएं चल रही है मगर इन्हें गति देने की जरूरत है।

आधुनिक युद्ध में साइबर स्पेस, अंतरिक्ष और इलेक्ट्रानिक वार फेयर की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्वचालित हथियार प्रणालियां युद्ध की प्रकृति को बदल रही हैं।

ऐसे में इन क्षेत्रों में रक्षा बजट का पूंजीगत निवेश बढ़ाना जरूरती है ताकि भविष्य की चुनौतियों का सामना प्रभावी ढंग से किया जा सके।

तीनों सेनाओं के बीच एकीकरण के लिए संयुक्त थिएटर कमांड बनाने की योजना को धरातल पर गति दिया जाना जरूरी है और अब इसे बजट तथा प्रशासनिक बाधाओं के दायरे से बाहर निकालना जरूरी है।

रक्षा पर खर्च करने वालों में भारत दुनिया के पांच देशों में शामिल है मगर फिर भी चीन, अमेरिका और रूस की तुलना में यह बेहद कम है।

वर्ष 2025-26 बजट में 6.81 लाख करोड़ रुपए रक्षा आवंटन था जो 2024-25 के मुकाबले करीब साढ़े नौ फीसद अधिक था मगर इसमें पूंजीगत आवंटन की हिस्सेदारी 1.81 लाख करोड़ रूपए ही थी।

पूंजीगत आवंटन के बारे में पूछे जाने पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने पिछले हफ्ते ही कहा था कि रक्षा खरीद की प्राथमिकताओं में फंड का कोई अवरोध नहीं आएगा सरकार ने इस बारे में सेनाओं को आश्वस्त किया है।
रक्षा आत्मनिर्भरता और थिएटर कमांड का एकीकरण महत्वपूर्ण

रक्षा आत्मनिर्भरता रक्षा विशेषज्ञ रिटायर मेजर जनरल जेकेएस परिहार कहते हैं, \“स्वदेशी हथियारों की सबसे बड़ी परीक्षा उनकी समय पर उपलब्धता और कसौटी पर खरा उतरने की है। मौजूदा परि²श्य में आत्मनिर्भरता की नीति और जमीनी हकीकत के बीच अंतर को पाटना होगा।

रक्षा पूंजीगत आवंटन में बड़ी वृद्धि इसके लिए जरूरी है क्योंकि रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा वेतन-पेंशन में जाता है। रक्षा बजट में बेशक हर वर्ष बढ़ोतरी होती है मगर यह सालाना मुद्रास्फीति के समायोजन के आस-पास ही रहती है और सैन्य आधुनिकीकरण को जिस गति से बढ़ाना है उसके लिए यह आवंटन पर्याप्त नहीं होते।\“

सेनाओं को आधुनिकीकरण की गति बढ़ाने पर जोर देते हुए मेजर जनरल परिहार कहते हैं, \“रूस-यूक्रेन, इजरायल-हमास तथा आपरेशन सिंदूरसे साफ है कि भविष्य में हाई इनटेनसिटी वाले छोटे युद्ध, मध्यम अवधि तथा दीर्घकाल की चार-पांच साल तक चलने वाली जंग होंगे जिसके लिए सेनाओं को तैयारी रखना होगा।

रक्षा बजट को जीडीपी के कम से कम तीन प्रतिशत के स्तर पर लाया जाए और राजस्व खर्च को पूंजीगत खर्च से अलग किया जाए।\“ जाहिर तौर पर वित्तमंत्री से सेनाओं की अपेक्षा रहेगी कि देश की सुरक्षा चुनौतियों के मद्देनजर रक्षा बजट का आवंटन निर्णायक रूप से बदलवकारी मार्ग की ओर ले जाए।
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