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प्रदूषण से बढ़ रही डायबिटीज, अब लोगों की सेहत ही नहीं; उनकी जेब पर भी सीधा डाल रहा डाका

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खतरनाक प्रदूषण से बचने के लिए मास्क लगाए लोग। फाइल फोटो- जागरण



अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। प्रदूषण के कारण बढ़ता डायबिटीज अब लोगों की सेहत ही नहीं, उनकी जेब पर सीधा डाका डाल रहा है। प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल ‘नेचर मेडिसिन‘ में प्रकाशित अध्ययन में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बिगड़ते हालात पर जल्द काबू में न किया गया तो डायबिटीज 2050 तक विश्व को 7,10,52,800 हजार करोड़ से अधिक का प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान पहुंचाएगी। यह चेतावनी किसी अनुमान पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक अध्ययनों के हवाले से दी गई है।

अमेरीका, भारत और चीन इस आर्थिक मार से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। चिंताजनक तथ्य यह है कि 45 प्रतिशत लोगों को अपनी बीमारी का पता ही नहीं होता और इनमें से लगभग नब्बे प्रतिशत इन्हीं देशों में हैं। साफ है कि डायबिटीज अब केवल स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि एक गंभीर आर्थिक और सामाजिक संकट भी बन चुका है।

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PM 2.5 से 22% तक बढ़ता है टाइप-टू डायबिटीज का खतरा

प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल बीएमजे ओपन डायबिटीज रिसर्च एंड केयर में प्रकाशित अध्ययन बताता है कि पीएम 2.5 जैसे बारीक प्रदूषक कणों के लंबे संपर्क में रहने से टाइप-टू डायबिटीज का खतरा 22 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।

दिल्ली और चेन्नई में बारह हजार से अधिक लोगों पर पिछले सात वर्षों तक किए गए वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आया कि प्रदूषण के बढ़ते स्तर के साथ ब्लड शुगर बढ़ता है, जिससे डायबिटीज के नए मरीज लगातार सामने आ रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार प्रदूषण वाले दिनों में पहले से डायबिटीज से जूझ रहे मरीजों में शुगर नियंत्रण बिगड़ता है, जिससे दवाइयों और जांच का खर्च बढ़ जाता है।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) और पब्लिक हेल्थ स्टडीज के अनुसार भारत में एक डायबिटीज मरीज पर औसतन पंद्रह हजार से बीस हजार वार्षिक निजी खर्च आता है। महानगरों, विशेषकर दिल्ली जैसे महानगरों में में यह 25 हजार से ऊपर पहुंच जाता है।

देश की लचर स्वास्थ्य व्यवस्था के कारण करीब 98 प्रतिशत मरीज को उपचार का खर्च अपनी जेब से उठाने को मजबूर हैं। नेशनल हेल्थ अकाउंट्स के मुताबिक भारत में इलाज का लगभग आधा खर्च लोगों को अपनी जेब से उठाना पड़ता है। डायबिटीज जैसी नान कम्युनिकेबल बीमारी कई परिवारों की सालाना आय का दस से बीस प्रतिशत तक खर्च करवा रही है, जिससे मध्यम और निम्न आय वर्ग पर आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है।
बीमारी एक, नुकसान कई

डायबिटीज से ग्रस्त व्यक्ति को समय से पहले मृत्यु का खतरा रहता है। यह बीमारी हृदय, आंख, गुर्दा, त्वचा और नसों को प्रभावित करती है। पीड़ित की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर करती है। नेचर मेडिसिन अध्ययन के अनुसार वर्ष 2001 में विश्व में करीब 53 करोड़ 70 लाख लोग डायबिटीज से पीड़ित थे। इनमें से तीन चौथाई से अधिक मरीज निम्न और मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं।
भारत पर बढ़ता आर्थिक दबाव

इस अध्ययन में दो सौ चार देशों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। इसके अनुसार वर्ष दो हजार बीस से दो हजार पचास के बीच भारत को अकेले डायबिटीज के कारण लगभग 1.32 लाख अरब का आर्थिक नुकसान हो सकता है। यह नुकसान इलाज, दवाइयों, नियमित जांच, समय से पहले मृत्यु और कामकाजी क्षमता में कमी से जुड़ा है।
बढ़ता वैश्विक संकट

डायबिटीज का यह संकट सिर्फ दिल्ली या भारत तक सीमित नहीं है। वर्ष 2025 में नेचर मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित वैश्विक अध्ययन के अनुसार वर्ष 2025 तक डायबिटीज विश्व को करीब 83 लाख करोड़ का प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान पहुंचाएगी।

अध्ययन बताता है कि मरीजों की देखभाल व कामकाजी नुकसान को जोड़ने पर यह बढ़कर लगभग 7,10,52,800 हजार करोड़ से अधिक हो कता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर वायु प्रदूषण पर सख्त नियंत्रण नहीं हुआ, तो डायबिटीज के मरीज और बढ़ेंगे और आम आदमी का स्वास्थ्य बजट और ज्यादा बिगड़ जाएगा।
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