झारखंड में करोड़ों साल पुराने राजमहल के जीवाश्मों को बचाने की जंग, विस में पेश होगा विशेष कानून
https://www.jagranimages.com/images/2026/01/20/article/image/saryu-ray-1768929580596.webpराजमहल की पहाड़ियों में बिखरे अनमोल जीवाश्मों को बचाने के बारे में जानकारी देते विधायक सरयू राय।
जागरण संवाददाता, जमशेदपुर। झारखंड की कोख में दफन करोड़ों साल पुराने प्राकृतिक रहस्यों को अब कानूनी सुरक्षा देने की तैयारी है। जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने राजमहल की पहाड़ियों में बिखरे अनमोल काष्ठ जीवाश्मों (Petrified Wood) को बचाने के लिए एक कदम उठाया है। ( Jharkhand\“s \“Jurassic Heritage\“) उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष रवींद्र नाथ महतो को सूचित किया है कि वे आगामी बजट सत्र-2026 में \“झारखंड भू-विरासत (जीवाश्म) विधेयक\“ पेश करेंगे।
जानें क्यों जरूरी है यह विधेयक?
साहेबगंज में एक जीवाश्म पार्क होने के बावजूद, साहेबगंज और पाकुड़ के विस्तृत इलाकों में ये जीवाश्म अब भी खुले में बिखरे पड़े हैं। सरयू राय ने चिंता जताई है कि स्पष्ट कानून के अभाव में खनन माफिया और क्रशर गतिविधियों से यह धरोहर नष्ट हो रही है।
उन्होंने कहा कि मानवीय हस्तक्षेप के कारण करोड़ों साल पुराने ये वैज्ञानिक साक्ष्य खत्म हो रहे हैं। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य सरकार को एक ऐसी नियमावली बनाने के लिए बाध्य करना है, जिससे इस विरासत का संरक्षण सुनिश्चित हो सके।
धरती के उथल-पुथल की गवाही: 14 करोड़ साल पुराना इतिहास राजमहल की पहाड़ियों में मौजूद ये जीवाश्म करीब 12 से 14 करोड़ साल पुराने हैं। यह उस जुरासिक काल की कहानी है जब ज्वालामुखी विस्फोटों और भारी उथल-पुथल के कारण विशाल जंगल लावे और मिट्टी के नीचे दब गए थे। लाखों वर्षों तक विशेष रसायनों के प्रभाव में रहने के कारण ये प्राचीन वृक्ष हू-ब-हू पत्थर में तब्दील हो गए। भू-वैज्ञानिकों के अनुसार, राजमहल की पहाड़ियां शोध के लिए एक खुली प्रयोगशाला की तरह हैं।
राजमहल में गोंडवानालैंड के दौर का है अवशेष यहां के अवशेष उस दौर के हैं जब भारत गोंडवानालैंड का हिस्सा था। यहां पेंटाक्सीलान जैसी विलुप्त और दुर्लभ वनस्पतियों के अवशेष मिलते हैं, जो दुनिया में अन्य कहीं भी मिलना लगभग असंभव है।
विडंबना यह है कि जागरूकता की कमी के कारण स्थानीय लोग और माफिया इन बेशकीमती धरोहरों को साधारण पत्थर समझकर निर्माण कार्यों में इस्तेमाल कर रहे हैं।
सरयू राय का यह गैर-सरकारी विधेयक इसी ऐतिहासिक भूल को सुधारने और झारखंड की इस वैश्विक धरोहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने की एक साहसिक कोशिश है।
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