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पहाड़ की आबोहवा में सूखे के साथ जंगल की आग का साया, 10 गुना बढ़ा ब्‍लैक कार्बन

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इस बार सर्दी में 15 प्रतिशत सूखा अब 25 प्रतिशत जंगल की आग से बिगड़ा पर्यावरण। जागरण आर्काइव



दीप सिंह बोरा, रानीखेत (अल्मोड़ा)। हिमालयी राज्य में मेघों की बेरुखी भारी पड़ रही है। खासतौर पर पर्यावरणीय लिहाज से सूखे जैसे हालात चिंता का सबब बनने लगे हैं। रही सही कसर सर्दी में धधक रहे जंगलों ने पूरी कर डाली है। धुएं के गुबार व धुंध में मौजूद ब्लैक कार्बन व अन्य हानिकारक गैस ने पश्चिमी विक्षोभ की ताकत कम कर वायुमंडलीय नमी सोख ली है। नतीजतन, बेहतर बर्फबारी तो दूर समूचा पहाड़ वर्षा को ही तरस गया है। प्रदूषण का आलम यह है कि हिमालयराज का दीदार भी दूभर होने लगा है।

प्राणवायु देने वाले पहाड़ में ब्लैक कार्बन की मात्रा का आठ से दस गुना बढ़ना और वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआइ) सौ का आंकड़ा पार करना चिंताजनक बन रहा है। शरदकाल में यह सीजन प्रकृति प्रेमी सैलानियों के लिए हिमदर्शन खास आकर्षण रहता था। मगर सर्दियों में धधक रहे वन क्षेत्रों से उठते धुएं के गुबार में हिमालय की चोटियां खो सी गई हैं। इससे पर्यटक भी मायूस हो रहे हैं। साथ ही रबी की करीब 10 से 15 प्रतिशत तक खेती सूखे की चपेट में आ चुकी है। वनाग्नि से पहाड़ की आबोहवा में घुल रहे ब्लैक कार्बन के साथ एरोसोल गैसें कार्बन डाई आक्साइड, कार्बन मोनोआक्साइड, सल्फेट आदि ने शरदकालीन वर्षा चक्र को ही प्रभावित कर दिया है।

जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं विकास संस्थान अल्मोड़ा के पूर्व विज्ञानी प्रो. जेसी कुनियाल कहते हैं कि वनाग्नि ही नहीं बाहरी क्षेत्रों जैसे सहारा मरुस्थल व इंडस गंगा का प्रदूषण भी हिमालय तक पहुंच चुका है। विज्ञानी शोध में इसकी पुष्टि हुई है। पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षा और आसमान साफ होने पर पर्यावरण में ब्लैक कार्बन दो-ढाई सौ नैनोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से ऊपर नहीं जाता है लेकिन इधर तीन माह से वर्षा न होने व वनाग्नि से यह डेढ़ से दो हजार नैनोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर अर्थात दस गुना वृद्धि तक पहुंच गया है।
पहाड़ी जिलों में 53 से अधिक घटनाएं

इस बार सर्दी में जंगलों में आगर की शुरूआत दफौट (बागेश्वर) से हुई। नवंबर 2025 में यहां भीषण आग लगी। फिर नीलेश्वर की पहाड़ी, मलसूना, देवताली, भैसूड़ा, मेहरखाली, टकनार व छतीना के वन चपेट में आए। सबसे ज्यादा घटनाएं अल्मोड़ा जिले में हुई हैं। यहां बिनसर अभयारण्य से लगे गैराड़, कसारदेवी, चितई, फलसीमा, पलेड़ीगाड़, उन्यूढ़ा, लमगड़ा के सत्यों, बख, शीतलाखेत, कठपुड़िया, कुरचौन व कफलकोट वन पंचायत, द्वारसौं, ज्योली, कटारमल, नैनी, पन्याली, उपराड़ी, गनियाद्योली, पाखुड़ा, सल्ट के गोदी व मानिला आदि जंगल जले।

पिथौरागढ़ में पंचाचूली की तलहटी के बुग्याल, बंगापानी, कालामुनि व खलियाटाप क्षेत्रों में लगभग दस घटनाएं हो चुकी हैं। नैनीताल जिले में थुआ, जाख, कैंची, रातीघाट से लगा वन क्षेत्र, सिल्टोना समेत आठ मामले आए हैं। चंपावत में अपेक्षाकृत जंगल कम जले हैं। यहां चंपावत रेंज, देवीधुरा, भिंगराड़ा, लोहाघाट, कालीकुमाऊं रेंज में एक-एक घटनाएं हो चुकी हैं।

चारों जिलों में करीब 62 घटनाओं में अब तक 260 हेक्टेयर के आसपास जंगल जल चुके हैं। इनमें कंट्रोल बर्निंग के साथ वन पंचायतें व नाप भूमि भी शामिल है। स्कालर फायर फारेस्ट इन उत्तराखंड व पर्यावरण विशेषज्ञ डा. रमेश सिंह बिष्ट अपने जमीनी अध्ययन का हवाला से बताते हैं कि कुमाऊं के अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत व पिथौरागढ़ तथा नैनीताल के पर्वतीय डिवीजन में सर्दी में नवंबर से अब तक 20 से 25 प्रतिशत जंगल जल चुके हैं।
पहाड़ में एक्यूआइ 150 पार

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों पर गौर करें तो इन दिनों अल्मोड़ा का एक्यूआइ 157 व हरेभरे रानीखेत का आंकड़ा 156 तक जा पहुंचा है। नैनीताल में भी यह 100 के आसपास है। हवा में अच्छी गुणवत्ता 50 से नीचे मानी गई है। यही हाल अन्य पर्वतीय जिलों का भी है। यानी कुमाऊं की पर्यावरणीय सेहत बहुत अच्छी नहीं है।


वन विभाग सतर्क हैं। कंट्रोल बर्निंग भी की जा रही है। आमजन से अपील है उत्तराखंड फायर एप डाउनलोड कर वास्तविक घटना की सही समय पर जानकारी उपलब्ध करा अलर्ट कर सकते हैं। इससे आग की घटना पर समय रहते काबू पाने में मदद मिलेगी। - दीपक सिंह, डीएफओ अल्मोड़ा

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