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गंगा में नहाने से मिलता है पुण्य, पर इस नदी के तो दर्शन मात्र से बदल जाता है भाग्य

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गंगा में नहाने से कैसे मिलता है पुण्य? (Image Source: AI-Generated)



दिव्या गौतम, एस्ट्रोपत्री। भारतीय संस्कृति में नदियों को केवल पानी का स्त्रोत नहीं माना जात बल्कि मां का स्थान दिया जाता है। इन नदियों में \“नर्मदा नदी\“ का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है, जिन्हें आनंद देने वाली नदी कहा गया है। वर्ष 2026 में 25 जनवरी के दिन जब देश भर में नर्मदा जयंती मनाई जाएगी, तब इस नदी का महत्व और भी बढ़ जाएगा। मध्य प्रदेश के अमरकंटक की सुंदर पहाड़ियों से निकलने वाली नर्मदा भारत की सबसे प्राचीन नदियों में से एक मानी जाती है। यह नदी पश्चिम दिशा की ओर बहती है और करोड़ों लोगों की आस्था का मुख्य केंद्र है। यह न केवल हमारी प्यास बुझाती है, बल्कि सदियों से चली आ रही हमारी महान सभ्यता और संस्कारों की रक्षक भी रही है।
नर्मदा का जन्म और पौराणिक कथाएं

पौराणिक कथाओं के अनुसार, नर्मदा नदी का जन्म भगवान शिव की तपस्या और उनके पसीने से हुआ है, इसीलिए इन्हें \“शिवपुत्री\“ भी कहा जाता है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि जब धरती पर महाप्रलय आता है, तब भी नर्मदा का अस्तित्व खत्म नहीं होता।

धार्मिक रूप से यह माना जाता है कि जो पुण्य गंगा में स्नान करने से मिलता है, वही फल नर्मदा मैया के केवल दर्शन करने से प्राप्त हो जाता है। इतिहास की नजर से देखें तो नर्मदा के किनारे कई बड़े राजाओं ने राज किया और बड़े-बड़े ऋषियों ने यहां शांति की तलाश में साधना की। प्राचीन ग्रंथों में इसे \“रेवा\“ नाम से पुकारा गया है। यह नदी उत्तर और दक्षिण भारत को आपस में जोड़ने वाली एक प्राकृतिक कड़ी मानी जाती है।
नर्मदा परिक्रमा और आध्यात्मिक शक्ति

नर्मदा नदी की सबसे खास बात इसकी \“परिक्रमा\“ है, जो दुनिया की किसी भी दूसरी नदी की नहीं की जाती। इस परिक्रमा का मतलब है नदी के उद्गम से लेकर समुद्र तक पैदल यात्रा करना और फिर वापस लौटकर आना। यह लगभग 3,300 किलोमीटर की लंबी यात्रा है, जिसे लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार पूरा करते हैं।

यह यात्रा इंसान को धैर्य और सादगी सिखाती है। एक पुरानी कहावत है कि \“नर्मदा का हर कंकर, शंकर है\“। इसका अर्थ है कि इस नदी में मिलने वाले पत्थर प्राकृतिक रूप से शिवलिंग का आकार ले लेते हैं, जिन्हें \“नर्मदेश्वर\“ कहा जाता है। लोग इन पत्थरों को बहुत पवित्र मानते हैं और अपने घरों में पूजते हैं, जो इस नदी की दिव्यता को दर्शाता है।
गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक विरासत

नर्मदा के किनारे बसे घाट और मंदिर हमारी सुंदर कला और इतिहास की गवाही देते हैं। महेश्वर, ओंकारेश्वर और जबलपुर का भेड़ाघाट ऐसे स्थान हैं, जहां जाकर मन को शांति मिलती है। महेश्वर के सुंदर घाटों को रानी अहिल्याबाई होल्कर ने बनवाया था, जो आज भी अपनी मजबूती और सुंदरता के लिए मशहूर हैं।

वैज्ञानिकों और इतिहासकारों का मानना है कि मानव सभ्यता की शुरुआत में भी लोग नर्मदा के किनारे रहा करते थे, क्योंकि यहां बहुत पुराने अवशेष मिले हैं। इसी नदी के किनारे आदि गुरु शंकराचार्य को उनके गुरु मिले थे, जिन्होंने उन्हें ज्ञान की शिक्षा दी थी। इस तरह नर्मदा केवल धर्म नहीं बल्कि ज्ञान और कला का भी प्रतीक है।


लेखक: दिव्या गौतम, Astropatri.com अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए hello@astropatri.com पर संपर्क करें।
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