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भारतीय मुद्रा के हजारों वर्षों का सफर; फूटी कौड़ी से डिजिटल रुपये तक, जानिए कई रोचक बातें

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भारतीय मुद्रा की कहानी।



संवाद सूत्र, जदिया (सुपौल)। आज के डिजिटल युग में जब खरीदारी के बाद लोग जेब टटोलने के बजाय मोबाइल निकालते हैं और एक क्लिक में भुगतान कर देते हैं, तब शायद ही कोई यह सोचता हो कि कभी इसी भारत भूमि पर सौदे फूटी कौड़ी और दमड़ी में हुआ करते थे।

आज का यह आधुनिक और तेज़ रफ्तार डिजिटल भुगतान तंत्र दरअसल हजारों वर्षों की उस यात्रा का परिणाम है, जिसने भारतीय मुद्रा को समय के साथ बदलते देखा है। यह सफर केवल पैसों का नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक चेतना का भी आईना है।
कौड़ी से शुरुआत, वहीं से बनी पहचान

प्राचीन भारत में जब सिक्कों का प्रचलन नहीं था, तब लेन-देन का माध्यम बनी थी कौड़ी। समुद्र से मिलने वाली यह छोटी-सी वस्तु उस समय सबसे प्रचलित मुद्रा थी।

कौड़ी का मूल्य बेहद कम होता था, इसलिए जब कोई चीज बिल्कुल बेकार समझी जाती थी, तो कहा जाता था यह तो फूटी कौड़ी के बराबर भी नहीं है। यही कहावत आज भी हमारी भाषा और संस्कृति में जीवित है, जो उस दौर की आर्थिक व्यवस्था की झलक देती है।
मौर्य काल से शुरू हुआ सिक्कों का दौर

मौर्य साम्राज्य के समय पहली बार व्यवस्थित रूप से धातु के सिक्के ढाले गए। इन्हें पण कहा जाता था। ये सिक्के व्यापार को स्थिरता देने वाले साबित हुए।

इसके बाद गुप्त काल आया, जिसे भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता है। इस काल में जारी सोने के सिक्के भारत की आर्थिक समृद्धि और व्यापारिक ताकत का प्रतीक बने।
शेरशाह सूरी और रुपये की नींव

मध्यकाल में मुद्रा व्यवस्था को सबसे बड़ा सुधार मिला शेरशाह सूरी के शासन में। उन्होंने चांदी के रुपये चलन में लाया, जो वजन और शुद्धता के आधार पर बेहद भरोसेमंद था।

यही रुपया आगे चलकर आधुनिक भारतीय मुद्रा की आधारशिला बना। मुगल काल में भी रुपया, आना और दमड़ी प्रचलन में रहे। गांवों में लंबे समय तक दमड़ी और कौड़ी से ही छोटी-छोटी जरूरतें पूरी होती रहीं।
ब्रिटिश काल और कागजी नोटों की शुरुआत

ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय मुद्रा प्रणाली में बड़ा बदलाव आया। वर्ष 1861 में पहली बार भारत में सरकारी कागजी नोट जारी किए गए। इसके साथ ही लेन-देन का दायरा और तेज हो गया।

आजादी के बाद 1957 में देश में दशमलव प्रणाली लागू हुई और 1 रुपया 100 पैसा तय किया गया। इसके साथ ही आना, दमड़ी और पाई इतिहास बन गए।
डिजिटल युग में प्रवेश

इक्कीसवीं सदी में भारत ने एक और ऐतिहासिक छलांग लगाई, डिजिटल करेंसी और आनलाइन भुगतान की ओर। आज यूपीआइ, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड और मोबाइल एप्स के माध्यम से पल भर में भुगतान हो जाता है।

अब जेब में नोट हों या न हों, मोबाइल होना ही काफी है। यह बदलाव न सिर्फ सुविधा लेकर आया, बल्कि पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में भी सहायक साबित हुआ।
मुद्रा नहीं, सभ्यता की कहानी है

फूटी कौड़ी से लेकर डिजिटल रुपये तक की यह सफर बताती है कि मुद्रा केवल लेन-देन का माध्यम नहीं, बल्कि किसी भी सभ्यता की सोच, व्यवस्था और विकास का प्रतिबिंब होती है।

आज जब हम एक क्लिक में भुगतान करते हैं, तब यह याद रखना जरूरी है कि इसके पीछे हजारों वर्षों का इतिहास, संघर्ष और बदलाव छिपा है।

भारतीय मुद्रा की यह कहानी हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है और यह एहसास कराती है कि समय चाहे जितना बदल जाए, लेन-देन की आवश्यकता और उसकी अहमियत हमेशा बनी रहेगी।
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