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सरस्‍वती पूजा : कालिदास की तपस्थली में हर वर्ष उमड़ती है कमल के फूल पर वीणा की श्रद्धा, पूजन व‍िध‍ि और व्‍यवस्‍था में है अंतर

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महाकवि कालिदास की तपोस्थली के रूप में विख्यात कट‍िहार का बेलवा गांव



राजकुमार साह, बारसोई (कटिहार)। महाकवि कालिदास की तपोस्थली के रूप में विख्यात बेलवा गांव में सरस्वती पूजा को लेकर उत्साह चरम पर है। गांव और आसपास के क्षेत्रों में आस्था, श्रद्धा और उमंग का माहौल है। यहां स्थित माता नील सरस्वती का यह अति प्राचीन धाम न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि अपने भीतर गहरे ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व को भी समेटे हुए है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, महाकवि कालिदास ने इसी स्थल पर माता नील सरस्वती की कठोर तपस्या कर दिव्य ज्ञान प्राप्त किया था।

माता की कृपा से ही वे अज्ञानी से विश्वविख्यात कवि बने और बाद में उज्जैन पहुंचकर महाराज विक्रमादित्य के नवरत्नों में स्थान प्राप्त किया। कहा जाता है कि प्राचीन काल में बेलवा क्षेत्र महानंदा नदी के तट पर स्थित घने जंगलों से घिरा हुआ था। इसी वन क्षेत्र में काले-नीले रंग की विशाल पत्थर की माता सरस्वती की प्रतिमा स्थापित थी। कालिदास ने इसी प्रतिमा के समक्ष तपस्या कर माता का साक्षात दर्शन किया था।
बेलवा में माता नील सरस्वती का प्राचीन धाम

स्थानीय पुरोहित राजीव चटर्जी बताते हैं कि मुगल काल में इस प्राचीन प्रतिमा को क्षति पहुंचाई गई। इसके बाद समय-समय पर चोरों द्वारा प्रतिमा चोरी के तीन प्रयास किए गए। पहले दो प्रयास विफल रहे, लेकिन 1980 के दशक में मोटर वाहन की मदद से माता की मूल प्रतिमा चोरी हो गई, जो आज तक बरामद नहीं हो सकी। इसके बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था में कोई कमी नहीं आई। वर्तमान में कोलकाता के एक व्यवसायी के सहयोग से सफेद संगमरमर की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है, जिसकी पिछले दस वर्षों से विधिवत पूजा-अर्चना हो रही है।
आस्था, इतिहास और तपस्या का संगम

मंदिर में सुबह-शाम भोग अर्पित किया जाता है और नियमित अनुष्ठान संपन्न होते हैं। मंदिर परिसर और उसके आसपास आज भी प्राचीनता के साक्ष्य मौजूद हैं। यहां दो विशाल प्राचीन शिवलिंग हैं, जिनमें से एक मंदिर में प्रतिष्ठित है, जबकि दूसरा मार्ग किनारे स्थित है। स्थानीय लोगों के अनुसार, क्षेत्र में खुदाई के दौरान प्राचीन ईंटें, धातु की लघु मूर्तियां तथा तालाब से कई पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो यहां एक उन्नत प्राचीन सभ्यता के अस्तित्व की ओर संकेत करते हैं।

मंदिर के समीप स्थित पोखर की खुदाई होने पर और महत्वपूर्ण अवशेष मिलने की संभावना जताई जा रही है। यहां बसी ब्राह्मण बस्ती द्वारा नियमित पूजा-अर्चना की जाती है। बीते तीन वर्षों से अंतरराष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ (इस्कान) ने इस प्राचीन मंदिर को गोद लिया है। मंदिर परिसर में माता सरस्वती के साथ भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा भी स्थापित की गई है। इस्कान के सेवक मंदिर की व्यवस्था, नियमित पूजा और संरक्षण कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। आस्था, इतिहास और संस्कृति का यह संगम आज भी बेलवा को एक विशिष्ट पहचान प्रदान करता है।
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