deltin33 Publish time 2026-1-23 12:27:58

बुरांस के डीएनए को जनवरी में मिल रहे मार्च की गर्मी के संकेत, समय से पहले खिल रहे फूल

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उच्च हिमालयी क्षेत्रों में औषधीय गुणों से भरपूर बुरांस के फूलों के समय से पूर्व खिलने और उसके प्रभाव की प्रक्रिया विज्ञानियों ने समझाई. File



सुमन सेमवाल, देहरादून। उत्तराखंड के ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में मिलने वाला औषधीय गुणों से भरपूर बुरांस (रोडोडेंड्रान) अब जलवायु परिवर्तन की तेज मार झेल रहा है। बिना वर्षा के तापमान के असामान्य रूप बढ़ने से इन फूलों का पूरा जीवन चक्र अस्त-व्यस्त हो गया है, जिससे इनके भविष्य पर गंभीर खतरा पैदा हो गया है।

सामान्य परिस्थितियों में बुरांस का डीएनए पौधे की कोशिकाओं को मार्च-अप्रैल में फूल बनने के संकेत भेजता है, जब तापमान 20 से 25 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचता है। लेकिन, अब यह तापमान जनवरी माह में ही मिलने लगा है। नतीजतन, फूल बनने की प्रक्रिया समय से पहले शुरू हो जा रही है। नहीं, इस अवधि में मौसम उतार-चढ़ाव में फूल टिक भी नहीं पाएंगे।

समय से पहले खिलते ही फूलों के मरने का खतरा बढ़ा
जनवरी में बुरांस की कलियां ठंड से बचने के लिए सेपल्स (अंखुडियां) से ढकी रहती हैं। ये सेपल्स तभी हटते हैं जब तापमान स्थिर रूप से बढ़ जाए। लेकिन तापमान कुछ दिनों के लिए ऊपर जाते ही डीएनए तुरंत संकेत दे देता है। जिससे फूल बनने वाले हार्मोन सक्रिय हो जाते हैं, पर उसके बाद फिर तापमान गिर जाता है। इस झटके को कोमल पुंकेसर और स्त्रीकेसर सहन नहीं कर पाते और फूल जल्दी मर जाते हैं।

एफआरआइ के 16 वर्षों के अध्ययन में सामने आई जलवायु परिवर्तन की गंभीर कहानी
वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआइ) की बाटनी और फारेस्ट फिजियोलाजी डिविजन ने बुरांस के समय से पूर्व खिलने को लेकर 16 साल पहले अध्ययन शुरू किया था। विशेषकर चमोली जिले के तुंगनाथ-चोपता क्षेत्र में किए गए अध्ययन में पाया गया कि पिछले कई मौसमों में बुरांस ने समय से पहले फूल दिए।

तब शोध का नेतृत्व करने तत्कालीन वरिष्ठ विज्ञानी (बाटनी डिविजन के प्रमुख) डा सुभाष नौटियाल ने किया था, जबकि अब फिजियोलाजी डिविजन के वरिष्ठ विज्ञानी डा हुकुम सिंह बुरांस पर अध्ययन में जुटे हैं। विज्ञानियों के अनुसार यदि यही प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले समय में बुरांस के नए पौधों की संख्या घटती जाएगी और यह हिमालयी पौधा संकट की ओर बढ़ सकता है।

सबसे ज्यादा प्रभावित है रोडोडेंड्रान अर्बोरियम
हिमालय में पाई जाने वाली बुरांस की चार प्रजातियों में से रोडोडेंड्रान अर्बोरियम यानी लाल बुरांस पर जलवायु परिवर्तन का सबसे गंभीर असर पाया गया है। यह प्रजाति मानव बस्तियों के करीब और ज्यादा ऊंचाई रेंज में पाई जाती है, इसलिए तापमान में तेजी से हो रहे बदलाव का प्रभाव इस पर सबसे पहले दिख रहा है।

उत्तराखंड में पाई जाने वाली बुरांस प्रजातियां और ऊंचाई

[*]रोडोडेंड्रान अर्बोरियम 5,000 से 8,500 फीट
[*]रोडोडेंड्रान बार्बेटम 7,000 से 9,000 फीट
[*]रोडोडेंड्रान कैंपनुलटम 10,000 से 11,000 फीट
[*]रोडोडेंड्रान लेपीडोटम 12,000 फीट व उससे ऊपर


अर्जुन वृक्ष पर भी जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
एफआरआइ की दूसरी अध्ययन इकाई इकोलाजी, क्लाइमेट चेंज एवं इंफ्लुएंस डिविजन ने अर्जुन (टर्मिनलिया अर्जुना) पर भी तापमान वृद्धि का परीक्षण किया। विज्ञानियों ने पौधे को प्रयोगशाला में 2.5 डिग्री सेल्सियस अधिक तापमान दिया। परिणाम चौंकाने वाले थे, जो नई पत्तियां सामान्यतः मार्च में निकलती थीं, वे फरवरी में ही दिखाई देने लगीं। यह संकेत है कि तापमान में मामूली बढ़ोतरी भी पौधों के प्राकृतिक जीवन चक्र को बदलने लगी है।

वर्षा की बेरुखी से कृषि से लेकर वन और पर्यटन तक का तानाबाना प्रभावित
इस शीतकाल में वर्षा की बेरुखी पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर भारी पड़ती दिख रही है। दिसंबर 2025 में उत्तराखंड में करीब 100 प्रतिशत वर्षा घाटा (रेन डेफिसिट) दर्ज किया गया। क्योंकि सामान्य रूप में 7.9 से 23.7 एमएम वर्षा पाई जाती है, जबकि ऐसा कुछ भी मौसम में नजर नहीं आया। वर्ष 2021 में सर्दियों में 182 एमएम वर्षा/बर्फबारी दर्ज की गई थी, जो 2024 में घटकर 12 एमएम और 2025 में 04 एमएम रह गई। जिसका नतीजा दिसंबर माह सूखा रहा और जनवरी 2026 में भी वर्षा की स्थिति ना के बराबर पाई गई। जिस कारण हिमपात की लगभग नगण्य है।

वर्षा में कमी के चलते उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों में गेहूं और सरसों की फसल को 25 प्रतिशत तक की क्षति पहुंची है। यदि ऐसा ही रहा तो मसूर और जौ की फसल भी गंभीर रूप से प्रभावित होगी। दूसरी तरफ वर्षा की नगण्यता के कारण जल स्रोतों और अन्य धाराओं में पानी की कमी महसूस की जाने लगी है।

इसके अलावा औली, चकराता, नीति घाटी और अन्य ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पर्यटकों की आमद में भी गिरावट पाई रही है। वर्षा की कमी के कारण सर्दियों में ग्लेशियरों के रिचार्ज होने की दर गंभीर रूप में प्रभावित हो रही है और सूखे के हालात बढ़ने से जंगल आग के लिहाज से संवेदनशील होते रहे हैं।

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