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Budget 2026: बजट में मैन्युफैक्चरिंग को मिलेगा बड़ा बूस्टर डोज? उद्यमियों ने बताईं समस्याएं, सरकार से की ये खास मांग

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राजीव कुमार, नई दिल्ली। चालू वित्त वर्ष 2025-26 के बजट (Budget 2026) में जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग (India manufacturing Sector) की हिस्सेदारी बढ़ाने एवं नए उद्यमियों को इस सेक्टर की तरफ आकर्षित करने के उद्देश्य से नेशनल मैन्युफैक्चरिंग मिशन का एलान किया गया था। उस समय माना जा रहा था कि इस कदम से भारत वैश्विक सप्लाई चेन में दुनिया के लिए चीन का विकल्प बन सकेगा। उस समय कहा गया था कि मैन्युफैक्चरिंग के लिए प्लग एंड प्ले की सुविधा दी जाएगी, जिससे सेक्टर के हिसाब से क्लस्टर आधारित उत्पादन शुरू होगा।

अब आगामी वित्त वर्ष 2026-27 के लिए एक फरवरी को बजट पेश होने जा रहा है, लेकिन नेशनल मैन्युफैक्चरिंग मिशन अब तक लॉन्च नहीं हो सका है। अब एक बार फिर वैश्विक अनिश्चितता और अमेरिका की तरफ से भारत पर 50 प्रतिशत शुल्क लगाने के बाद मैन्युफैक्चरिंग को एक बड़े बूस्टर डोज की जरूरत है। रोजगारपरक कई सेक्टर के निर्यात पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, जिससे अंतत: मैन्युफैक्चरिंग ही प्रभावित होगी।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में काफी संभावनाएं

मैन्युफैक्चरिंग प्रत्यक्ष के साथ अप्रत्यक्ष रोजगार का सृजन करता है। लिहाजा आर्थिक के अलावा राजनीतिक रूप से भी सरकार के लिए मैन्युफैक्चरिंग को तेज गति देना जरूरी होगा। उद्यमियों का कहना है कि किसी यूनिट की स्थापना के लिए सबसे बड़ी समस्या जमीन की है, क्योंकि इसकी कीमत काफी अधिक है। सैकड़ों नियमों को हटाने के बावजूद अब भी दर्जनों लाइसेंस और मंजूरी लेने की जरूरत पड़ती है।

सरकार ने सिंग्ल विंडो पोर्टल शुरू तो किया, लेकिन वह पोर्टल ऐसा नहीं है कि वहां से मंजूरी के बाद उद्यमी सभी मंजूरी से मुक्त हो जाए। जॉब वर्क कराने के लिए दूरदराज जाना पड़ता है। प्लग एंड प्ले माडल में उद्यमियों को सारी सुविधाएं एक जगह मिल जाती हैं और उन्हें सिर्फ मशीन लाकर उत्पादन शुरू करना होता है। वियतनाम, इंडोनेशिया, चीन में भारत की तुलना में उत्पादन लागत 20 प्रतिशत कमउद्यमियों का कहना है कि मैन्युफैक्चरिंग की अधिक लागत भी उद्यमियों को यूनिट लगाने से पीछे धकेलती है।
लॉजिस्टिक लागत ज्यादा है

दुनिया के बाजार में भारत को मुकाबला देने वाले देश वियतनाम, इंडोनेशिया, चीन में भारत की तुलना में उत्पादन लागत 20 प्रतिशत कम है। भारत में उत्पादन करने वाले उद्यमियों को मिलने वाले लोन की दर, औद्योगिक बिजली की दर इन देशों के मुकाबले अधिक है। भारत में लाजिस्टिक लागत भी अधिक है। इन वजहों से उत्पादन लागत अधिक होती है जिसका समाधान आगामी बजट में करने की जरूरत है। निर्माण लागत अधिक होने से कारोबारी उत्पादन की जगह उन वस्तुओं का आयात करके उसकी बिक्री करने लगता है।

क्वालिटी कंट्रोल को लेकर सरकार दुविधा की स्थिति में जानकारो का कहना है कि क्वालिटी कंट्रोल को लेकर भी दुविधा है। अच्छे उत्पाद के लिए क्वालिटी कंट्रोल होना चाहिए जबकि कई सेक्टर में क्वालिटी कंट्रोल के नियम लागू होने के बाद उसे वापस ले लिया गया। ऐसे में जो उद्यमी क्वालिटी कंट्रोल के नियम के पालन की तैयारी कर रहे हैं, वे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात बढ़ाने के लिए क्वालिटी की जरूरत है। वस्तुत: भारत को इस बाबत चीन से थोड़ा अलग चलने की जरूरत है। यानी हर निर्माण में क्वालिटी की शर्त होनी चाहिए ताकि भारतीय उत्पाद का डंका बजे। बजट में इसे लेकर सरकार को अपना पक्ष स्पष्ट करना होगा।

आयात बढ़ने से मैन्युफैक्चरिंग होगी प्रभावित उद्यमियो का कहना है आयात बढ़ने से सेवा सेक्टर को नहीं बल्कि वस्तुओं के निर्माण को खतरा है। मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने के तमाम प्रयास के बावजूद निर्यात के मुकाबले देश का आयात 50 प्रतिशत अधिक है। चालू वित्त वर्ष 2025-26 के अप्रैल-दिसंबर में वस्तु निर्यात 330 अरब डालर का तो आयात 578 अरब डालर का रहा। वस्तु निर्यात के मुकाबले सर्विस निर्यात की बढ़ोतरी दर दोगुनी है और इस दर के कायम रहने पर जल्द ही भारत का सेवा निर्यात वस्तु निर्यात से अधिक हो जाएगा।

जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी 16-17 प्रतिशत कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार से लेकर वर्तमान राजग सरकार की तरफ से पिछले 25 साल से जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी बढ़ाने की लगातार कोशिश की जा रही है। तब भी देश की जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी 16-17 प्रतिशत से अधिक नहीं हो पाई है। संप्रग सरकार में यह हिसेदारी 14 प्रतिशत थी और इसे 25 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया था। लक्ष्य अब भी यही है।


निर्मल कुमार मिंडा, प्रेसिडेंट, एसोचैम का कहना है कि वियतनाम समेत कई देशों में निजी प्लेयर मैन्युफैक्चरिंग के लिए सभी सुविधाओं से लैस भवन और पूरा इलाका विकसित करते हैं। वहां कोई भी उद्यमी एक निश्चित रकम देकर तत्काल रूप से उत्पादन शुरू कर सकता है। हमारे देश में भी निजी क्षेत्र के सहयोग से इस प्रकार की सुविधा विकसित करने की जरूरत है। सरकार को बजट में ऐसा प्रविधान करना चाहिए।-


अनिल भारद्वाज, महासचिव, फेडरेशन आफ इंडियन माइक्रो, स्माल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज ने कहा कि सस्ती जमीन सबसे बड़ी समस्या है और फिर सही कीमत पर कच्चे माल की उपलब्धता। इसका समाधान निकालना होगा। हाईटेक मैन्युफैक्चरिंग के लिए सरकार को उद्योग को टेक्नोलाजी मदद देनी होगी। उम्मीद है कि कच्चे माल की सुलभ उपलब्धता के लिए सरकार बजट में सभी प्रकार के कच्चे माल के आयात पर लगने वाले शुल्क को समाप्त कर सकती है।
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