ताजमहल के मजदूरों की पसंद से लेकर CM योगी की लिस्ट तक... आगरा के इस व्यंजन का इतिहास कर देगा हैरान
https://www.jagranimages.com/images/2026/01/23/article/image/sdf-1769181534863_m.webpजागरण संवाददाता, आगरा। शहर के विशेष व्यंजन को नई पहचान मिल सकती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शनिवार को लखनऊ में एक जिला एक व्यंजन के तहत उत्पादों के नाम की घोषणा करेंगे। एक जिला एक उत्पाद में पेठे को पहले ही शामिल किया जा चुका है। विदेशों तक इसका नाम है। वहीं दूसरे व्यंजन जो विशेष पहचान रखते हैं इसमें दालमोंठ, गजक और बेड़ई के नाम जिला उद्योग केंद्र ने भेजे हैं। अब इंतजार है कि उप्र दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री द्वारा जारी होने वाले नामों में किस-किस को स्थान मिल पाता है।
वर्ष 1865 में पहली बार खांड का पेठा बना इसको लाल पेठा भी कहा जाता था। इसके बाद धीरे-धीरे दूसरे लोगों ने भी निर्माण शुरू किया और नूरी दरवाजा इसका प्रमुख केंद्र बन गया। पेठा पहले सब्जी और परिवर्तन के साथ 25 से 30 वैरायटी अपना स्वाद बिखेर रही हैं।
पंछी पेठा के स्वामी सुनील गोयल बताते हैं कि खांडसे शुरू हुआ पेठा आज कई चाकलेट, पान, सैंडविच सहित दूसरी वैरायटी में अपने स्वाद के लिए पहचान बना चुकी हैं। दालमोंठ भी सादा और मेवा दोनों तरह की आती हैं। प्राचीन पेठा के स्वामी राजेश अग्रवाल बताते हैं कि पेठा और दालमोंठ दोनों की खूब पसंद की जाती है। शहर में 1200 दुकानें हैं और प्रतिदिन 10 हजार किलोग्राम पेठा बनता है। 400 से 500 करोड़ रुपये वार्षिक करोबार है।
बारीक बेसन सेब और मसूर की दाल में 14 तरह के मसालों को डाला जाता है। धीरे-धीरे इसमें कद़दू, तरबूज के बीज, मेवा का प्रयोग भी होने लगा और ये घर-घर का स्वाद बन गई। नूरी दरवाजे स्थित दालमोंठ तैयार कराने वाले दीपक अग्रवाल बताते हैं कि सुबह के नास्ते और शाम की चाय के साथ दालमोंठ खूब पसंद की जाती है।
देशी घी, डालडा और मूंगफली के तेल में इसका निर्माण होता है। दाल मोंठ की शुरुआत तो 100 वर्ष से अधिक पुरानी है। देशी घी के साथ विभिन्न मसाले, मेवा और स्वास्थ्य वर्धक बीजों का प्रयोग इसे और बेहतर बनाता है। स्वाद के साथ लोग स्वास्थ्य लाभ भी ले रहे हैं। 100 करोड़ रुपये वार्षिक कारोबार है।
शहर के लोगों के दिन की शुरुआत बेड़ई के नाश्ते के साथ ही होती है। हर गली-गली और नामचीन दुकानों पर सुबह से ही इसका स्वाद लेने वालों की भीड़ लगती है। देश घी, रिफाइंड के साथ ही सरसों के तेल की बेड़ई खाने के लिए लोग प्रमुख बाजारों में जाते हैं। एक लाख बेड़ई प्रतिदिन की खपत है।
10 रुपये से 22 रुपये प्रति पीस तक इसका मूल्य है। शहर में गजक का कारोबार नूरी दरवाजे पर प्रमुखता से होता है। तिल, गुड़ और मूंगफली के साथ ही शहर की पुरानी नामचीन दुकानों, पुराने बाजार में गजक का बड़ा कारोबार है। चीनी की कुटैमा, पट्टी, मेवा वाली, गुड़ की गजक, मूंगफली वाली चिक्की, तिल बर्फी, तिल मेवा लड्डू, रेबड़ी की खूब मांग है।
चाकलेट गजक, गजक रोल, मेवा वाली गजक गुजिया भी खूब पसंद की जाती है। 35 से 40 वैरायटी बाजार में उपलब्ध है। कारोबारी यशवंत बताते हैं कि तीन से चार महीने का कारोबार गजक का है। दीपावली के साथ आती है और होली से पहले समाप्त हो जाती है। शहर में दो हजार से अधिक थोक, फुटकर की दुकानों पर प्रतिदिन 15 लाख रुपये का कारोबार है।
ये है इतिहास और वैरायटी
पेठे का इतिहास सीधे ताजमहल के दौर से जुड़ा माना जाता है। शाहजहां के शासनकाल में ताजमहल के निर्माण के दौरान संगमरमर की नक्काशी पर काम करने वाले श्रमिकों के लिए जल्द ऊर्जा देने वाला शुद्ध, सस्ता खाद्य पदार्थ के रूप में तैयार कराया गया। जो जल्दी खराब भी नहीं हो।
इसके लिए कद्दूवर्गीय फल सफेद कद्दू या पेठा प्रयोग में लाया गया। इसकी वैरायटी सफेद पेठा, केसर पेठा, संतरा पेठा, खांड पेठा, अंगूरी पेठा, सैंडविच पेठा, पान पेठा, चाकलेट पेठा, क्यूब पेठा, स्ट्राबेरी पेठा, तिरंगा पेठा, गुलकंद पेठा, गुलाब लड्डू पेठा, शामिल है।
दालमोंठ में ये मसाले होते हैं प्रयोग
काली मिर्च, लोंग, खटाई, जावित्री, जायफल, सौंठ, सेंदा नमक, काला नमक, दालचीनी, पीपल, बड़ी इलायची, लाल मिर्च, हींग का प्रयाेग होता है।
एक जिला एक उत्पाद के तहत दालमोंठ, गजक और बेड़ई का नाम भेजा गया है। लखनऊ में मुख्यमंत्री द्वारा चयनित नाम की घोषणा होगी। वहीं ओडीओपी में पेठा पहले से शामिल है। -अनुज कुमार, संयुक्त आयुक्त उद्योग
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