बिहार के लिए बड़ा फायदा! बंटवारे में पहली बार मिल सकता 900 क्यूसेक गंगा जल, क्या होगा असर?
https://www.jagranimages.com/images/2026/01/23/article/image/Ganga-1769184023343_m.webpगंगा जल बंटवारे में बिहार के लिए बड़ी उम्मीद। सांकेतिक तस्वीर
राज्य ब्यूरो, पटना। गंगा के पानी में बिहार को 900 क्यूसेक की हिस्सेदारी मिल सकती है। अगर ऐसा हुआ तो यह पहली बार होगा, क्योंकि अभी तक गंगा के पानी मेंं बिहार का कोई हिस्सा निर्धारित नहीं है।
हालांकि, इसका अंतिम रूप से निर्णय नहीं हुआ है, लेकिन गंगा जल बंटवारे के लिए गठित जल शक्ति मंत्रालय की आंतरिक समिति ने अपनी रिपोर्ट में बिहार को शुष्क अवधि में 900 क्यूसेक पानी देने की अनुशंसा की है। जनवरी से मई तक का समय शुष्क अवधि होता है, जब पानी की सर्वाधिक किल्लत होती है।
बांग्लादेश और भारत के बीच गंगा जल बंटवारे की संधि 30 वर्ष पहले हुई थी, जिसकी अवधि इस वर्ष 12 दिसंबर को समाप्त हो रही है।
संधि के नवीकरण के लिए दोनों देशों की ओर से गंगा में पानी की वर्तमान उपलब्धता का आकलन हो रहा है। यह आकलन पिछले सप्ताह शुरू हुआ है, जो क्रमश: मई तक चलेगा।
[*]आंतरिक समिति ने की अनुशंसा, बांग्लादेश से जल संधि के नवीनीकरण के समय पक्की स्थिति होगी स्पष्ट
[*]पानी मिलेगा जनवरी से मई के बीच की शुष्क अवधि में, अभी तक बिहार का कोई हिस्सा निर्धारित नहीं
[*]हिस्सा तय होने पर बिहार के दक्षिणी हिस्से में पेयजल और सिंचाई के लिए पानी की आवश्यकता होगी पूरी
उसके बाद दोनों देशों के बीच पानी के बंटवारे का फार्मूला तय होगा। सूत्रों के अनुसार, बिहार ने भी इस समझौते में एक पक्ष बनने की अपेक्षा जताई थी, इस आशा के साथ कि उसकी कम-से-कम 2000 क्यूसेक की हिस्सेदारी तय हो जाएगी।
बहरहाल प्रस्तावित नई संधि से बिहार को अपने दक्षिणी क्षेत्र के लिए पानी की आवश्यकता पूरी कर पाने की आशा बंधी है। यह आवश्यकता पेयजल के साथ सिंचाई परियोजनाओं से भी जुड़ी हुई है।
बिहार में पेयजल की कुछ परियोजनाओं की निर्भरता गंगा पर है, जबकि जलाशयों को भरने के लिए पाइप-लाइन से गंगा का पानी पहुंचाए जाने का प्रस्ताव भी है।
ये जलाशय दक्षिणी बिहार में हैं और संबंधित प्रस्ताव पर केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के साथ जल संसाधन विभाग की बातचीत प्रगति पर है।
फरक्का बराज की उपयोगिता
बंगाल में मुर्शिदाबाद जिलान्तर्गत फरक्का में गंगा पर 1975 में फरक्का बांध का निर्माण हुआ था। इसका मुख्य उद्देश्य हुगली नदी में पानी का एक हिस्सा मोड़ना था, ताकि कोलकाता बंदरगाह की नौ-वहन क्षमता बनी रहे।
इसके अलावा, सिंचाई आदि जैसे अन्य उद्देश्यों के लिए भी यह उपयोगी रहा है। बाद में, 1996 की संधि के अंतर्गत भारत और बांग्लादेश के बीच जल बंटवारे के नियमन में भी इस बांध का उपयोग होने लगा।
बिहार का नुकसान दोतरफा
गंगा जल बंटवारा संधि अंतरराष्ट्रीय है, लेकिन इससे सर्वाधिक प्रभावित बिहार ही है। शुष्क मौसम में पानी की कमी और वर्षा ऋतु में बाढ़। इसका मूल कारण बराज के कारण गंगा में गाद का जमा होते जाना है।
इसी कारण बिहार को समझौते के कुछ पहलुओं पर आपत्ति भी रही है, क्योंकि पुराने समझौते में उसे सम्मिलित नहीं किया गया था। नए समझौते में बिहार के हितों का ध्यान रखा जा रहा है। हालांकि, अंतिम समझौता होने पर ही हिस्सेदारी पक्की होगी।
[*]12 दिसंबर, 1996 को भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे के लिए 30 वर्षाें की संधि हुई थी। उसके नवीनीकरण के लिए पहल शुरू हो चुकी है।
[*]बांग्लादेश में गंगा को पद्मा कहते हैं। जल बंटवारे के फार्मूला के लिए गंगा पर फरक्का बराज और पद्या पर हार्डिंग ब्रिज पर पानी के स्तर की संयुक्त माप होती है।
यह संधि फरक्का बराज से गंगा जल के बंटवारे से जुड़ी है, जहां भारत और बांग्लादेश के बीच वर्तमान फार्मूला लागू होता है, लेकिन इसमें बिहार या बंगाल के लिए अलग से आंतरिक आवंटन नहीं है।
वर्तमान फार्मूला
[*]50000 क्यूसेक या उससे कम पर भारत और बांग्लादेश को 50-50 प्रतिशत
[*]70000 से 75000 क्यूसेक पर बांग्लादेश को 35000 क्यूसेक, शेष भारत को
[*]75000 क्यूसेक से अधिक पर 40000 क्यूसेक भारत को, शेष बांग्लादेश को
Pages:
[1]