deltin33 Publish time 2 hour(s) ago

बजट बिगुल: कानून-व्यवस्था और पुलिस सुधार, विकसित भारत के लिए केंद्र को संभालनी होगी कमान

https://www.jagranimages.com/images/2026/01/24/article/image/Police-1769262127367_m.webp

कानून-व्यवस्था और पुलिस सुधार।



नीलू रंजन, नई दिल्ली। सामान्यतौर पर कानून-व्यवस्था और त्वरित न्याय की चर्चा बजट में नहीं सुनाई देती है। लेकिन हकीकत यही है कि किसी भी देश में बेहतर कानून-व्यवस्था और त्वरित न्याय सीधे पर निवेश, आर्थिक विकास और समृद्धि से जुड़ा है। भारत में विभिन्न राज्यों में आर्थिक निवेश की स्थिति में भी इसे देखा जा सकता है।

असम समेत पूर्वोत्तर के राज्यों में हिंसा कम होने के बाद और उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था में सुधार के बाद निवेश में बढ़ोतरी इसकी अहमियत को रेखांकित करते हैं। वहीं दूसरा पहलू यह है कि अगर न्याय सही समय पर न हो तो समावेशी विकास में अड़चन पैदा करता है। न्याय में देरी का सबसे अधिक खामियाजा निवेशकों को भुगतना पड़ता है।

सरकार ने निवेशकों को अदालती लेट लतीफी से निजात दिलाने के लिए कामर्शियल ट्रिब्युनल्स बनाया। लेकिन हकीकत यह है कि एनसीएलटी, एनसीएलएटी, डीआरटी, आइटीएटी, टीडीसैट, सैट जैसे ट्रिब्युनल्स इसमें विफल साबित हो रहे हैं। इनमें 3.56 लाख विवाद लंबित हैं जिनमें 24.72 लाख करोड़ रुपये फंसे हैं जो कि भारत की 2024-2025 की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का 7.48 प्रतिशत है।

जिन समस्याओं के समाधान के लिए कार्मशियल ट्रिब्युनलों की स्थापना हुई थी आज वे उन्हीं समस्याओं का सामना कर रही हैं। विभिन्न कामर्शियल ट्रिब्युनलों में दबाव के कारण अलग अलग हैं लेकिन रिपोर्ट प्रणालीगत (सिस्टेमेटिक) कमजोरी की एक जैसी कहानी की ओर संकेत करती है। त्वरित न्याय के लिए न्यायिक इंफ्रास्टक्चर को ठीक करने के लिए पिछले बजटों में आवंटन किया गया था लेकिन वह नाकाफी साबित हो रहा है।

संवैधानिक रूप से ये विषय राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। उसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि 2047 तक भारत को विकसित बनाने और एक मजबूत आर्थिक शक्ति के रूप में खड़ा करने के लिए भारत को पूरे देश में कानून व्यवस्था की स्थिति बेहतर बनाने के लिए विशेष कोशिश करनी होगी। इसे सिर्फ राज्यों का विषय होने का हवाला देकर टाला नहीं जा सकता है।

कानून-व्यवस्था का सीधा संबंध पुलिस सुधारों पर है। लेकिन राज्यों का विषय होने के कारण इसमें कोई प्रगति नहीं हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने 2007 में ही पुलिस सुधारों के लिए विस्तृत दिशानिर्देश जारी किया था। लेकिन किसी भी राज्य ने इसे लागू नहीं किया। दिशा निर्देशों में अपराधों की जांच और सामान्य पुलिसिंग के लिए अलग-अलग पुलिस फोर्स बनाने की बात भी शामिल है।

लेकिन हालात यह है कि राज्य सरकारें पुलिस बलों की रिक्त पदों को भरने में भी कोताही बरत रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक पूरे देश में पुलिस बलों में तय पदों में पांच लाख पद रिक्त है। ध्यान रहे कि न्याय की शुरूआत पुलिस से ही होती है।

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह के अनुसार कानून-व्यवस्था भले ही राज्यों का विषय है, लेकिन इसे राज्यों के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए। उनके अनुसार पुलिस सुधारों की कमान केंद्र सरकार को अपने हाथ में लेना चाहिए। इसमें ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च और विकास (बीपीआरडी) केंद्रीय भूमिका निभा सकती है।

इसे पूरे देश के लिए एक समान पुलिसिंग का पूरा खाका तैयार करना चाहिए और सभी राज्यों को इसे लागू करने के लिए मजबूर करना चाहिए। इसके लिए जरूरत पड़ने पर विशेष बजटीय प्रविधान भी किये जा सकते हैं।

विक्रम सिंह ने साफ किया कि पुलिस आधुनिकीकरण के नाम पर राज्यों को भेजी जाने पर केंद्रीय सहायता नाकाफी है और उसका इस्तेमाल पुलिस बल को अत्याधुनिक उपकरण और हथियार मुहैया कराने के बजाय प्रिंटर और जीरोक्स मशीन खरीदने जैसे कामों में हो रहा है।

न्यायालयों की स्थिति और भी नाजुक है। विक्रम सिंह के अनुसार अदालतों में पांच करोड़ मामलों के लंबित होने का सीधा मतलब है कि पांच करोड़ लोग न्याय से वंचित हैं। इससे अपराधियों के हौसले बढ़ते हैं। नए अपराधिक कानूनों भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम में इसे दुरूस्त करने की कोशिश हुई है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह केस दर्ज होने से लेकर राष्ट्रपति तक क्षमा याचिका दाखिल करने तक की प्रक्रिया पांच साल में पूरी होने का दावा कर रहे हैं। लेकिन इससे जमीन पर आने में अभी वक्त लगेगा। खुद अमित शाह ने इसे पूरी तरह से अमल में आने में तीन साल का समय लगने की बात कह रहे हैं। लेकिन ये नए आपराधिक कानूनों के तहत दर्ज मामलों पर ही लागू होगा।

पुराने पांच करोड़ लंबित मामलों को निपटाने की कोई स्पष्ट कार्ययोजना नहीं दिख रही है। इसी तरह से केंद्र सरकार ने सात हजार करोड़ रुपये की लागत से पूरी आपराधिक न्याय प्रणाली के डिजिटलीकरण की योजना पर काम कर रही है। इसके लिए ई-प्रिजन, ई-प्रोसेक्यूशन, ई-कोर्ट और सीसीटीएनएस के तहत जेलों, अभियोजकों, अदालतों और थानों के डाटा को डिजिटल बनाया गया है।

इसके अलावा इन सभी डाटा को आपस में जोड़ने की योजना पर भी काम चल रहा है। लेकिन उसका प्रभाव त्वरित और निष्पक्ष न्याय में दिखना बाकी है।
Pages: [1]
View full version: बजट बिगुल: कानून-व्यवस्था और पुलिस सुधार, विकसित भारत के लिए केंद्र को संभालनी होगी कमान

Get jili slot free 100 online Gambling and more profitable chanced casino at www.deltin51.com