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मौसम पूर्वानुमान : अलर्ट हो जाइए... अब कैलेंडर से नहीं, कंडीशन से चल रहा मौसम, फसल चक्र भी हो रहा प्रभाव‍ित

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Weather forecast: बांका के खेतों में ड्रिप और मिनी स्प्रिंकलर



जागरण संवाददाता, भागलपुर। Weather forecast: जलवायु परिवर्तन के दौर में अब मौसम कैलेंडर से नहीं, कंडीशन से चल रहा है। सरस्वती पूजा का समय कभी भागलपुर में बसंत की दस्तक का संकेत माना जाता था। दिन में तेज धूप, सुबह-शाम हल्की ठंड और आम के बागानों में मंजर की खुशबू का दृश्य आम था। लेकिन बीते एक-दो दशक में माहौल बदल गया है।

अब सरस्वती पूजा तक गंभीर ठंड बनी रहती है। फरवरी के बाद अचानक गर्मी बढ़ने लगती है। मौसम के इसी बदलते मिजाज ने अब खेती के पारंपरिक फसल चक्र को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है। किसान कहते हैं कि अब खेती तारीख देखकर नहीं, मौसम की चाल देखकर करनी पड़ रही है।

पहले जैसा स्थिर नहीं रहा मौसम

बीएयू के मौसम विज्ञानी डा. बीरेंद्र कुमार ने बताया कि भागलपुर जिले में पहले कृषि आधारित मौसम का अपेक्षाकृत तय क्रम रहता था। नवंबर-दिसंबर में सर्दी मजबूत होती थी, जनवरी में ठंड चरम पर रहती थी और फरवरी से धीरे-धीरे बसंती गर्माहट बढ़ती थी। मानसून जून के आसपास पहुंचता था, जिससे धान की रोपनी और खरीफ फसलों का समय तय रहता था। यह स्थिरता खेती के लिए सबसे बड़ी ताकत थी, क्योंकि किसान बिना ज्यादा जोखिम के फसल योजना बना लेते थे।
अब सर्दी देर से, बीच में टूटती और लंबी खिंचती है

अब सर्दी का समय आगे खिसक रहा है। कई बार दिसंबर तक ठंड कमजोर रहती है और जनवरी में अचानक शीतलहर तेज हो जाती है। कभी-कभी फरवरी तक भी ठिठुरन बनी रहती है। इसका सीधा असर रबी सीजन पर पड़ रहा है। देर से ठंड आने पर खेत की तैयारी और बुआई का संतुलन बिगड़ जाता है।

[*]मौसम के बदलते मिजाज ने खेती के पारंपरिक फसल चक्र को कर दिया है प्रभावित
[*]फरवरी तक ठिठुरन बने रहने का रबी सीजन पर पड़ रहा है सीधा असर
[*]गेहूं में अब पहले जैसी न भराव रही और न ही चमक, बढ़ती जा रही है लागत
[*]देर से ठंड आने पर खेत की तैयारी और बुआई का बिगड़ रहा है संतुलन

गर्मी जल्दी शुरू, गेहूं को टर्मिनल हीट का खतरा

भागलपुर क्षेत्र में फरवरी के बाद तापमान तेजी से बढ़ने लगता है। मार्च आते-आते गर्म हवा और तेज धूप गेहूं के लिए चुनौती बन जाती है। गेहूं का सबसे संवेदनशील समय दाने भरने का होता है। इसी दौरान अगर गर्मी बढ़ जाए तो दाना सिकुड़ जाता है, वजन घटता है और उत्पादन प्रभावित होता है। किसानों का कहना है कि अब गेहूं में पहले जैसी भराव और चमक नहीं रह गई, जबकि सिंचाई और लागत बढ़ती जा रही है।
मानसून अब कम दिनों में ज्यादा बारिश वाला हो गया

धान की खेती मानसून पर निर्भर है, लेकिन अब मानसून का पैटर्न अनियमित होता जा रहा है। कभी रोपनी के समय पर्याप्त पानी नहीं मिलता, तो कभी एक-दो दिन में भारी बारिश से खेतों में जलभराव हो जाता है। इससे पौधे कमजोर होते हैं, खेत की मेड़ें टूटती हैं और कई बार कटाव भी बढ़ जाता है। बारिश के लंबे गैप के कारण बोरिंग और पंप सेट पर निर्भरता बढ़ी है, जिससे खेती की लागत सीधे बढ़ रही है।
धान-मक्का-सब्जियों में बढ़ा रोग

मौसम में अचानक बदलाव का दूसरा असर कीट और रोगों के रूप में सामने आ रहा है। धान में झुलसा और कीट प्रकोप की आशंका बढ़ जाती है। मक्का और सब्जियों में भी तापमान बढ़ने पर फूल झड़ने, फल कम बनने और गुणवत्ता गिरने की शिकायतें सामने आती हैं। सबौर के रजंदीपुर के किसान विनोद मंडल कहते हैं कि पहले जो रोग कभी-कभार आते थे, अब हर सीजन किसी न किसी रूप में नुकसान दे रहे हैं।
आम का मंजर हुआ दुर्लभ, बसंत का संकेत भी कमजोर

भागलपुर के लिए आम का मंजर सिर्फ बागवानी नहीं, बल्कि मौसम का प्राकृतिक संकेत भी रहा है। पहले सरस्वती पूजा के आसपास मंजर की उपलब्धता आम थी, लेकिन अब यह कहीं-कहीं ही नजर आता है। बागवानों का कहना है कि ठंड की अवधि और तापमान के उतार-चढ़ाव ने मंजर आने का चक्र बिगाड़ दिया है। असमय बारिश और अचानक गर्मी भी फूल को नुकसान पहुंचाती है, जिससे फलन प्रभावित होता है।
खेती का पारंपरिक गणित पड़ गया कमजोर

बदलते मौसम के बीच किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि खेती का पारंपरिक गणित कमजोर पड़ गया है। अब रबी में जल्दी बुआई, कम अवधि वाली किस्मों और समय पर सिंचाई पर जोर बढ़ा है। खरीफ में रोपनी भी अब पहले जैसी निश्चित तारीख पर नहीं हो रही। कुल मिलाकर भागलपुर में मौसम बदलाव का असर खेती की लागत, जोखिम और उत्पादन-तीनों पर साफ दिख रहा है। किसान मानते हैं कि आने वाले समय में जल प्रबंधन, जलनिकासी, मौसम आधारित सलाह और लचीला फसल चक्र ही इस चुनौती का सबसे मजबूत जवाब होगा।
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