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कर्नाटक में मिला 63.5 लाख टन रेयर अर्थ एलिमेंट्स का भंडार, घटेगी चीन पर निर्भरता

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कर्नाटक के गुंडलुपेट क्षेत्र में आरईई धारक कार्बोनाटाइट शैलों का परीक्षण करते बीएचयू के भूविज्ञानी डा. रोहित पांडेय व शोधार्थी समीर देबनाथ।सोर्स : बीएचयू



संग्राम सिंह, वाराणसी। देश की खनिज संपदा और रणनीतिक आत्मनिर्भरता को मजबूती देने वाली एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि सामने आई है। कर्नाटक में चामराजनगर जिले के गुंडलुपेटे क्षेत्र में 63.5 लाख टन रेयर अर्थ एलिमेंट्स (आरईई) और इट्रियम के विशाल भंडार की पहचान की गई है। यह खोज बीएचयू के भू-विज्ञान विभाग के विज्ञानियों ने की है, जिसे भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआइ) के प्रारंभिक अनुमानों से भी बल मिला है।

रेयर अर्थ एलिमेंट्स का उपयोग स्मार्टफोन, इलेक्टि्रक वाहन, रक्षा उपकरण, एयरोस्पेस, पवन टर्बाइन और हरित ऊर्जा से जुड़े आधुनिक उद्योगों में किया जाता है। वर्तमान में भारत बड़े पैमाने पर विशेष रूप से चीन से इनके आयात पर निर्भर है। ऐसे में यह खोज भारत को तकनीकी और सामरिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है।

बीएचयू के भू-विज्ञान विभाग के डा. रोहित पांडेय ने बताया कि गुंडलुपेटे क्षेत्र में रेयर कार्बोनाटाइट-साइनाइट आग्नेय परिसर की पहचान की गई है। यह क्षेत्र लगभग 2.5 अरब वर्ष पुराना है, जब पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत ही हो रही थी। शोध में अत्याधुनिक यूरेनियम-सीसा (यू-पीबी) डे¨टग तकनीक का उपयोग किया गया, जिससे चट्टानों की आयु और उत्पत्ति का सटीक निर्धारण हो सका।

शोध के अनुसार, इस क्षेत्र में भू-गर्भीय गतिविधियां दो चरणों में हुईं। पहले चरण में लगभग 2.59 अरब वर्ष पूर्व गुलाबी साइनाइट चट्टानों का निर्माण हुआ। इसके करीब 12 करोड़ वर्ष बाद दूसरे चरण में सफेद कार्बोनाटाइट चट्टानों का अंत:प्रवेश हुआ।

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गुंडलुपेटे क्षेत्र में सेरियम, लैंथेनम, नायोबियम और फास्फोरस जैसे रेयर अर्थ एलिमेंट्स पाए गए हैं, जो भविष्य की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हरित ऊर्जा और उन्नत तकनीकों के लिए बेहद आवश्यक हैं। इस अंतरराष्ट्रीय स्तर के शोध में बीएचयू के डा. रोहित पांडेय और शोधार्थी डा. महेंद्र कुमार सिंह के साथ भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के समीर देबनाथ, राष्ट्रीय पृथ्वी विज्ञान अध्ययन केंद्र तिरुवनंतपुरम के डा. एन.वी. चलपति राव, ट्रिनिटी कालेज, डब्लिन, आयरलैंड के डा. डेविड च्यू और रूस के कार्पिंस्की भूवैज्ञानिक अनुसंधान संस्थान के डा. बोरिस बेल्यात्स्की शामिल रहे। यह शोध हाल ही में नीदरलैंड के एल्सेवियर समूह के जर्नल \“प्रीकैंब्रियन रिसर्च\“ में प्रकाशित हुआ है।

आर्थिक, सामरिक भविष्य की आधारशिला बनेंगी गुंडलुपेटे की चट्टानें

भारत के उत्तर-पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों में गुजरात का अंबा डोंगर, राजस्थान का न्यूआनिया, तमिलनाडु का होगेनक्कल, सेवत्तुर और मेघालय की संग वैली जैसे क्षेत्रों में भी कार्बोनाटाइट परिसर पाए गए हैं। इसके बावजूद देश को अपने अधिकांश रेयर अर्थ एलिमेंट्स की आवश्यकता आयात से पूरी करनी पड़ती है। गुंडलुपेटे की यह चट्टानें भारत के आर्थिक और सामरिक भविष्य की मजबूत आधारशिला बन सकती हैं।
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