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गैलेंट्री मेडल की कहानी; 72 घंटे कैदियों का राज, गोलियों-बमों के बीच कुंदन कृष्णन ने बचाई छपरा जेल

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डीजी कुंदन कृष्‍णन, रिटायर्ड डीएसपी अर्जुन लाल व एसआई जितेंद्र स‍िंंह। फाइल फोटो



राज्य ब्यूरो, पटना। Police Medal for Gallantry: बिहार कैडर के तेजतर्रार आइपीएस कुंदन कृष्णन (DG, STF), दारोगा अर्जुन लाल और सिपाही जितेंद्र सिंह को छपरा जेल को कैदियों के कब्जे से मुक्त कराने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने गैलेंट्री पदक देने की घोषणा की है।

किसी फिल्म की कहानी की तरह लगने वाली यह घटना करीब 24 साल पुरानी है। छपरा मंडल जेल के कैदियों ने स्थानांतरण आदेश के खिलाफ विद्रोह करते हुए जेल को ही अपने कब्जे में ले लिया।
22 साल पुराने मामले में बिहार पुलिस को मिला तीन गैलेंट्री मेडल

करीब 1200 कैदी उस समय जेल में थे। कैदियों ने अवैध हथियार और विस्फोटक इकट्ठा कर जेल परिसर के बाहर भी अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था।

सरकारी संपत्ति को तो नुकसान पहुंचाया ही, जेल सुरक्षा में तैनात पुलिस और जेल कर्मचारियों पर भी हमला कर दिया। नतीजा, छपरा मंडल कारा 28 मार्च 2002 की सुबह से 30 मार्च 2002 तक पूरी तरह उपद्रवी कैदियों के कब्जे में रहा।

राज्य सरकार के आदेश पर 30 मार्च को प्रशासन के द्वारा कार्रवाई शुरू की गई। उस समय कुंदन कृष्णन सारण के एसपी थे।

उन्होंने अदम्य साहस का परिचय देते हुए अपने नेतृत्व में दल बल के साथ जेल परिसर में प्रवेश किया। इस दौरान पुलिस और उपद्रवी कैदियों के बीच भीषण मुठभेड़ हुई।

कैदियों ने गोला-बारूद से पुलिस पर हमला किया। पुलिस ने भी आत्मरक्षा में आंसू गैस के साथ हथगोलों का इस्तेमाल किया।

करीब तीन से चार घंटे के संघर्ष के बाद पुलिस प्रशासन ने वापस छपरा जेल पर अपना नियंत्रण हासिल किया और कैदियों को भागने से रोका गया।
कार्रवाई में चार कैदियों की हुई थी मौत, 28 पुलिसकर्मी हुए थे घायल

उपद्रवी कैदियों के द्वारा इस्तेमाल किये गए 33 चक्र 312 बोर और 12 बोर के खोखा तथा बम के अवशेष बरामद किए गए।

इस अभियान में तत्कालीन एसपी कुंदन कृष्णन खुद भी घायल हुए। उनके साथ जिला पुलिस, सैन्य पुलिस और गृह रक्षक सहित 28 जवान घायल हुए थे। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में चार कैदियों की मौत हुई थी जबकि सात कैदी घायल हुए थे।
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