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कौन हैं पानीपत हैंडलूम को विदेश तक पहुंचाने वाले खेमराज सुंदरियाल? जिन्हें मिलेगा पद्मश्री अवॉर्ड

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पानीपत हैंडलूम को विदेश तक पहुंचाने वाले खेमराज सुंदरियाल। फाइल फोटो



मनोज खर्ब, पानीपत। 83 वर्षीय खेमराज सुंदरियाल ने पानीपत के हैंडलूम उद्योग को नई पहचान देकर इसे देश-विदेश के बाजारों तक पहुंचाया। मूल रूप से उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के गांव सुमाड़ी निवासी राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित खेमराज सुंदरियाल को कला के क्षेत्र में पद्मश्री सम्मान के लिए चुना गया है।

खड्डी से जीवन की शुरुआत करने वाले खेमराज ने अपने नवाचार, परिश्रम और सामाजिक सरोकार से हैंडलूम कला को शिखर तक पहुंचाया। पांच फरवरी 1943 को जन्मे खेमराज ने आर्थिक तंगी के बीच गांव में आठवीं और उत्तराखंड के श्रीनगर से दसवीं तक की पढ़ाई की। संसाधनों की कमी के कारण उन्होंने बुनाई और रंगाई में डिप्लोमा किया।
कला यात्रा को मिला नया आयाम

डिप्लोमा के बाद रोजगार की तलाश में वे मुजफ्फरनगर, यमुनानगर, मेरठ और सहारनपुर गए, लेकिन कहीं काम नहीं मिला। इसके बाद दिल्ली क्लाथ मिल में नौकरी मिली, जिसने उनके करियर को दिशा दी।

वर्ष 1966 में रचनात्मक कुछ नया करने की चाह ने उन्हें दिल्ली के बुनकर सेवा केंद्र से जोड़ा, जहां से उनकी कला यात्रा को नया आयाम मिला। उन्होंने देश के विभिन्न बुनकर सेवा केंद्रों में कार्य करते हुए टेपेस्ट्री बुनाई, जामदानी और मैक्रैम जैसी तकनीकों को विकसित किया।

वर्ष 1966 में मैक्रैम तकनीक से बनाए गए लैंप शेड बनारस के बुनकरों के लिए नियमित आय का साधन बने। उन्होंने बनारस के साड़ी बुनकरों को टेपेस्ट्री बुनाई से जोड़कर ऐसी कलाकृतियां तैयार कराईं, जो साड़ियों की तुलना में बनाना आसान और अधिक लाभकारी रहीं। वर्ष 1980 में उन्होंने हथकरघा उद्योग में पॉलिएस्टर को शामिल किया और ऊनी धागे में जामदानी तकनीक विकसित कर हिमाचल प्रदेश के शाल बुनकरों को प्रशिक्षित किया।
सहकारी समिति की स्थापना की

पानीपत में पारंपरिक खेस को किया पुनर्जीवित वर्ष 1975 में पानीपत आकर उन्होंने पारंपरिक खेस को पुनर्जीवित किया। नए डिजाइन, आधुनिक रंगाई और बुनाई तकनीकों के जरिए खेस, बेडशीट और पर्दे के कपड़े को स्वदेशी और विदेशी बाजारों तक पहुंचाया।

उन्होंने पानीपत में एक सहकारी समिति की स्थापना की, जो बीते 12 वर्षों से प्रतिवर्ष 25 से अधिक बुनकरों को प्रशिक्षण और रोजगार उपलब्ध करा रही है। उनकी तकनीकों और प्रयासों से पानीपत हैंडलूम एक प्रमुख निर्यात केंद्र के रूप में उभरा। खेमराज सुंदरियाल ने न केवल बुनकरों, बल्कि छात्रों और समाज के वंचित वर्गों के लिए भी कार्य किया।
छात्रों को इंटर्नशिप का मौका

उन्होंने एनआइएफटी, एनआइडी और ललित कला महाविद्यालय के छात्रों को स्वेच्छा से प्रशिक्षण दिया और एनआइएफटी कांगड़ा के विद्यार्थियों को अपनी सहकारी समिति में इंटर्नशिप का अवसर दिया।

इसके अलावा तिहाड़ जेल और करनाल जेल के कैदियों सहित एक हजार से अधिक युवाओं को प्रशिक्षण देकर रोजगार और स्वरोजगार की दिशा दिखाई। खेमराज सुंदरियाल का जीवन संघर्ष, नवाचार और समाज सेवा के माध्यम से भारतीय हैंडलूम परंपरा को सशक्त करने की प्रेरक गाथा है।
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