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मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में 3000 सैनिकों की परेड, 1500 दर्शक और 31 तोपों की सलामी; कैसे मनाया गया था देश का पहला गणतंत्र दिवस?

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भारत के पहले गणतंत्र दिवस की झलक। फोटो - X



डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। आज देश में 77वां गणतंत्र दिवस मनाया जा रहा है। 77 साल पहले आज ही के दिन भारत का संविधान लागू हुआ था। हर बार की तरह इस बार भी गणतंत्र दिवस के खास मौके पर कर्तव्य पथ (पहले राजपथ) पर सेना अपने शौर्य का प्रदर्शन करेगी। दिल्ली में भारतीय थल सेना से लेकर नौसेना और वायु सेना के पराक्रम की गूंज पूरे देश में सुनाई देगी।

राष्ट्रपति के तिरंगा फहराने से लेकर रंग-बिरंगी झांकियां, सैन्य परेड और मुख्य अतिथि की उपस्थिति जैसी चीजें गणतंत्र दिवस पर नई नहीं हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि देश का पहला गणतंत्र दिवस कैसे मनाया गया था?

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क्यों चुनी 26 जनवरी की तारीख?

पहले गणतंत्र दिवस की कहानी तारीख तय करने से शुरू होती है। आपने कभी सोचा है कि गणतंत्र दिवस के लिए 26 जनवरी को ही क्यों चुना गया?

मशहूर इतिहासकार रामचंद्र गुहा की किताब \“India After Gandhi\“ में इस दिन को बहुत बारीकी से पेश किया गया है। गुहा लिखते हैं कि ये तारीख कोई नई नहीं थी – 26 जनवरी 1930 को कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज की मांग की थी। जब संविधान 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया, तो जानबूझकर इसे ठीक दो महीने बाद, 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया।

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कैसे मनाया गया पहला गणतंत्र?

26 जनवरी 1950 की सुबह राष्ट्रपति भवन (तब गवर्नमेंट हाउस) में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भारत के पहले राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली। गुहा के अनुसार, ये पल बहुत भावुक था क्योंकि देश अभी भी विभाजन की तबाही से उबर रहा था। देश में लाखों शरणार्थियों की समस्या, दंगे और गरीबी अपने चरम पर थी। इसी बीच राष्ट्रपति ने राष्ट्रध्वज फहराया और 31 तोपों की सलामी हुई। शाम को दिल्ली को रोशनी से सजाया गया, पूरा शहर \“परिलोक\“ जैसा दिख रहा था।

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गणतंत्र दिवस की पहली परेड

आज हम कार्तव्य पथ (पुराना राजपथ) पर भव्य परेड देखते हैं, लेकिन पहली परेड Irwin Amphitheatre (अब मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम) में हुई थी। गुहा लिखते हैं कि 3000 से ज्यादा सैनिकों ने मार्च किया था। पहली बार देश ने एकसाथ भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना का शौर्य देखा था। परेड में तीनों सेनाओं के जवान, पुलिस और पैरामिलिट्री फोर्सेस शामिल थे।

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गुहा के अनुसार, स्टेडियम में मौजूद करीब 15,000 लोग इस भव्य परेड के गवाह बने थे। आसमान में भारतीय वायुसेना के पुराने Liberator प्लेन उड़े, जो आजादी की लड़ाई में इस्तेमाल हुए थे। 31 तोपों की सलामी के साथ राष्ट्रपति ने सलामी ली। ये परेड राजपथ जैसी लंबी नहीं थी, बल्कि स्टेडियम में सादगी भरी लेकिन दिल को छू लेने वाली थी।

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क्यों खास था ये दिन?

अपनी किताब में गुहा बताते हैं कि 1947 के बाद देश में अस्थिरता का माहौल था। देश पाकिस्तान से युद्ध की आशंका, आर्थिक चुनौतियां, भाषाई विवाद से जूझ रहा था। मगर, 26 जनवरी 1950 के भव्य समारोह ने दिखाया कि भारत एकजुट हो सकता है।

राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि ये दिन सिर्फ कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के सपनों की जीत है। देश के पहले गणतंत्र दिवस पर इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो को गेस्ट ऑफ ऑनर के तौर पर बुलाया गया था।

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