Ayushman Bharat: अब अस्पतालों की मनमानी पर लगेगी लगाम, डॉक्टरों की फीस लिमिट तय
https://www.jagranimages.com/images/2026/01/26/article/image/doctor-1769408530447_m.webpडॉक्टरों की कंसल्टेंसी फीस की मनमानी पर रोक। फाइल फोटो
कुंदन सिन्हा, मेदिनीनगर (पलामू)। आयुष्मान भारत और ESIC योजनाओं से जुड़े जिले के लाखों लाभार्थियों के लिए राहत भरी खबर है। स्वास्थ्य सेवाओं में वर्षों से चली आ रही डॉक्टरों की कंसल्टेंसी फीस की मनमानी पर अब प्रभावी रोक लग गई है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की नई व्यवस्था के तहत निजी व सूचीबद्ध अस्पतालों में डॉक्टरों की कंसल्टेंसी फीस की अधिकतम सीमा तय कर दी गई है।
नई व्यवस्था के अनुसार, एमबीबीएस डॉक्टर की कंसल्टेंसी फीस अधिकतम 350 रुपये और सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर की कंसल्टेंसी फीस 700 रुपये से अधिक नहीं ली जा सकेगी।
यह निर्णय आयुष्मान भारत और ईएसआईसी के तहत इलाज को अधिक पारदर्शी, सुलभ और मरीज-हितैषी बनाने के उद्देश्य से लिया गया है।
स्वास्थ्य विभाग के निर्देशों के मुताबिक, यदि कोई अस्पताल या चिकित्सक निर्धारित शुल्क से अधिक राशि वसूलते हुए पाया गया तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
इसमें संबंधित अस्पताल को पैनल से हटाना, जुर्माना लगाने के साथ अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाई भी शामिल है। माना जा रहा है कि इस फैसले से इलाज के नाम पर मनमानी वसूली की शिकायतों पर प्रभावी रोक लगेगी।
मजदूर और मध्यम वर्ग को मिलेगा सीधा फायदा
पलामू जिला समेत पूरे प्रमंडल क्षेत्र में बड़ी संख्या में मजदूर, निम्न और मध्यम आय वर्ग के लोग आयुष्मान भारत और ईएसआईसी योजनाओं पर निर्भर हैं। कंसल्टेंसी फीस की अधिकतम सीमा तय होने से उन्हें आर्थिक बोझ से राहत मिलेगी और समय पर इलाज कराना आसान होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से स्वास्थ्य सेवाओं पर लोगों का भरोसा बढ़ेगा और मरीजों का शोषण रुकेगा।
सीजीएचएस ने भी किए थे रेट में बदलाव
पिछले वर्ष सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (सीजीएचएस) ने अपनी रेट लिस्ट में बदलाव करते हुए ओपीडी कंसल्टेंसी फीस को डॉक्टर की योग्यता और विशेषज्ञता से जोड़ने का प्रावधान किया था।
मंत्रालय द्वारा जारी नए स्पष्टीकरण में स्पष्ट किया गया है कि 700 रुपये की फीस केवल डीएम/एमसीएच सुपर स्पेशलिस्ट कंसल्टेंसी पर लागू होगी, सभी चिकित्सकों पर नहीं।
जानें क्या है योजना?
भारत सरकार की एक सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य बीमा योजना है, जो 1948 अधिनियम के तहत काम करती है। यह ₹21,000 से कम मासिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों को बीमारी, मातृत्व, विकलांगता और कार्यस्थल पर चोट लगने की स्थिति में मुफ्त इलाज व नकद सहायता प्रदान करती है।
[*]स्वास्थ्य सेवाएं: बीमारी के दौरान छुट्टी लेने पर, प्रमाणित होने पर मजदूरी का 70% तक नकद भुगतान किया जाता है (वर्ष में 91 दिनों तक)।
[*]मातृत्व लाभ: महिला कर्मचारियों को 26 सप्ताह तक का मातृत्व अवकाश और पूरी मजदूरी का भुगतान।
[*]विकलांगता लाभ: कार्यस्थल पर दुर्घटना के कारण अस्थायी या स्थायी रूप से विकलांग होने पर, जब तक अक्षमता रहती है, तब तक मजदूरी का 90% तक भुगतान।
[*]आश्रित लाभ: कार्यस्थल पर मृत्यु होने की स्थिति में, आश्रितों (पत्नी/बच्चों) को मासिक पेंशन मिलती है।
[*]अंत्येष्टि व्यय: कर्मचारी की मृत्यु पर अंतिम संस्कार के लिए ₹10,000 तक की सहायता।
[*]योग्यता और लागू क्षेत्र: यह योजना 10 या अधिक कर्मचारियों वाले गैर-कृषि प्रतिष्ठानों पर लागू होती है।
[*]कर्मचारी और नियोक्ता का योगदान: कर्मचारी को अपने वेतन का 0.75% और नियोक्ता को 3.25% का अंशदान हर महीने करना होता है।
[*]कवरेज की आय सीमा: ₹21,000 या उससे कम मासिक आय (विकलांग कर्मचारियों के लिए ₹25,000) वाले श्रमिक इस योजना के तहत आते हैं।
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