cy520520 Publish time 2026-1-26 16:56:27

Republic Day: जिन शहीदों के संघर्षों से मिली आजादी, आज उनके वंशज दो वक्त की रोटी के मोहताज

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संवाद सूत्र, सोनो (जमुई)। शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा... गणतंत्र दिवस पर जब देश तिरंगे में रंग जाता है, परेड की गूंज और देशभक्ति के गीतों से वातावरण राष्ट्रभक्ति से सराबोर होता है, तब यह सवाल और भी चुभने लगता है कि क्या जिन वीर सपूतों ने आजादी की नींव रखी, उनके परिवार आज भी सम्मान और सुरक्षा के हकदार नहीं हैं?

जिस संविधान और लोकतंत्र पर आज देश गर्व करता है, उसकी मजबूत बुनियाद रखने वाले सोनो प्रखंड के कई स्वतंत्रता सेनानियों के वंशज आज गरीबी, बेरोजगारी और उपेक्षा की त्रासदी झेल रहे हैं।

1942 की भारत छोड़ो आंदोलन की ज्वाला में घुटवे गांव के ठाकुर यमुना प्रसाद अग्रिम पंक्ति के सेनानी थे। भागलपुर जेल में उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की अमानवीय यातनाएं झेलीं, लेकिन देशभक्ति की लौ बुझने नहीं दी।

बहुभाषाविद यमुना प्रसाद की पहचान इतनी मजबूत थी कि उनकी मित्रता देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से थी। दिल्ली प्रवास के दौरान जब नेहरू ने उनसे कुछ मांगने को कहा तो उन्होंने पद, जमीन या सम्मान की बजाय नेहरू का ओवरकोट मांगा।

यह ओवरकोट आज भी परिवार के पास ऐतिहासिक धरोहर की तरह सुरक्षित है। विडंबना यह है कि जिस विरासत पर देश को गर्व होना चाहिए, उसी परिवार के बेटे कार्यानंद सिंह और मनोज कुमार आज जर्जर मकान और सीमित संसाधनों में खेती-बाड़ी के सहारे जीवन गुजारने को मजबूर हैं।
कलम के सिपाही की खामोश विरासत

स्वतंत्रता संग्राम में सिर्फ हथियार ही नहीं, कलम भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक बड़ा हथियार बनी। जनार्दन प्रसाद उर्फ श्रीकिरण ने निर्भीक पत्रकारिता के जरिये अंग्रेजी शासन की सच्चाई देश के सामने रखी।

आज उनकी पहचान इतिहास के पन्नों तक सीमित रह गई है। उनके परिवार के हालात भी सरकार और समाज की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करते हैं।
पति-पत्नी दोनों ने काटी जेल, फिर भी उपेक्षा कायम

केंदुआलेवार गांव के बंधु महतो और उनकी पत्नी जीरा देवी ने आजादी की लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया। दोनों ने जेल की सलाखों के पीछे यातनाएं झेलीं।

आज गांव में बंधु महतो की प्रतिमा तो स्थापित है, लेकिन उनके वंशजों को सरकारी योजनाओं, सम्मान या आर्थिक संबल का लाभ नहीं मिल पाया।

अब जब संविधान की शपथ लेकर जनप्रतिनिधि देश को आगे बढ़ाने का संकल्प लेते हैं, तब यह सवाल और तीखा हो जाता है कि क्या शहीदों का सम्मान सिर्फ समारोह, भाषण और प्रतिमाओं तक सीमित रहना चाहिए?

क्या उनके परिवारों को सम्मानजनक जीवन देना लोकतंत्र की जिम्मेदारी नहीं है? क्या स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों की बदहाली गणतंत्र की आत्मा पर चोट नहीं है?
सच्ची श्रद्धांजलि का समय

गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराने और देशभक्ति के गीत गाने के साथ अब वक्त आ गया है कि प्रशासन और समाज मिलकर इन सेनानियों के परिवारों के लिए ठोस पहल करे।

आवास, पेंशन, शिक्षा सहायता, रोजगार और सम्मानजनक जीवन की व्यवस्था ही इन वीरों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी, तभी गणतंत्र दिवस का उत्सव केवल औपचारिक नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी का प्रतीक बन सकेगा।
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