Chikheang Publish time 2026-1-26 16:56:46

Republic Day: हाथों में तिरंगा और छाती पर गोली...भारत छोड़ो आंदोलन में शहीद हुए थे बेलहर के तीन सपूत

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कुंदन सिंह, बेलहर (बांका)। वर्ष 1942 में जब अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन पूरे देश में चरम पर था, तब बेलहर अंचल भी आजादी की ज्वाला से अछूता नहीं रहा। अंग्रेजी हुकूमत आंदोलनकारियों की तलाश में गांवों से लेकर जंगलों और पहाड़ों की गुफाओं तक छापेमारी कर रही थी।

घोड़ों की टाप से गांवों की खामोशी टूट जाती थी, लेकिन इसके बावजूद क्रांतिवीरों का हौसला बुलंद था। देश को आजाद कराने का जुनून ही उनका एकमात्र मकसद था।

बेलहर थाना क्षेत्र में अंग्रेज सिपाहियों की क्रूरता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। आंदोलनकारियों के घरों और गांवों में जुल्म की दास्तां लिखी जा रही थी।

महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों पर कोड़ों की बरसात होती थी। गांवों में सख्त पहरा लगाया गया था, ताकि क्रांतिवीर अपने घरों तक न पहुंच सकें।

स्वजनों को दी जा रही यातनाओं से लोगों में जबरदस्त आक्रोश था, लेकिन अंग्रेजी शासन के भय से खुलकर विरोध संभव नहीं हो पा रहा था।

इसी दमन और अत्याचार के विरोध में आंदोलनकारियों ने साहसिक कदम उठाते हुए बेलहर थाना को आग के हवाले कर दिया। क्रांतिवीरों के साहस और पराक्रम के आगे अंग्रेज सिपाही बौने साबित हुए।

इससे बौखलाए अंग्रेज सिपाहियों ने छिपकर गोलियों की बरसात शुरू कर दी। इस गोलीबारी में बनगामा और चुहटिया गांव के वीर सपूत यमुना सिंह, अद्या सिंह और गुदर सिंह हाथों में तिरंगा थामे वीरगति को प्राप्त हो गए।

बलिदान स्थल पर दशकों बाद स्मारक का निर्माण संभव हो सका, लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज भी बलिदानियों के स्वजन शासन और प्रशासन की अनदेखी का शिकार हैं। उनके परिवार आज मेहनत-मजदूरी पर आश्रित हैं, जबकि बलिदानियों का पैतृक गांव आज भी पहचान को मोहताज है।

गांव में अब तक एक स्थायी स्मारक तक का निर्माण नहीं हो सका है, जो आजादी की इस अमिट गाथा को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचा सके।
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