deltin55 Publish time 2026-2-1 12:33:41

AI, टैरिफ़ और दवा: भारत–EU की रणनीति समझें


                                               
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जैसे-जैसे वैश्विक स्तर पर टैरिफ़ यानी शुल्क लगाने की धमकियाँ तेज़ हो रही हैं और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) दवा विकास की पारंपरिक प्रक्रियाओं को गहराई से बदल रहा है, वैसे-वैसे फार्मास्यूटिकल क्षेत्र का स्वरूप भी बदलता जा रहा है. दवाएँ अब केवल स्वास्थ्य से जुड़ा विषय नहीं रह गई हैं बल्कि उन्हें वैश्विक व्यापार और भू-राजनीति में एक प्रभावी रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है. विभिन्न देश अपनी आर्थिक और राजनीतिक प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने के लिए दवा आपूर्ति, कीमतों और उत्पादन क्षमताओं को दबाव के साधन के रूप में देख रहे हैं.


इस बदलते परिदृश्य का सबसे स्पष्ट प्रभाव ट्रांस-अटलांटिक संबंधों पर दिखाई देता है. अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच आर्थिक साझेदारी गहरी होने के बावजूद, दवाओं पर संभावित टैरिफ़ और नियामक मतभेद आपसी भरोसे की परीक्षा ले रहे हैं. दवा आपूर्ति श्रृंखलाओं की जटिल वैश्विक संरचना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी एक क्षेत्र में लिया गया नीति निर्णय कई देशों की स्वास्थ्य सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है.


इसी संदर्भ में भारत और यूरोपीय संघ के बीच सहयोग का रणनीतिक महत्व और बढ़ गया है. भारत जेनेरिक दवाओं और सक्रिय औषधि तत्वों (API) का एक प्रमुख वैश्विक आपूर्तिकर्ता है, जबकि यूरोप नवाचार और नियामक अनुभव में अग्रणी है. AI आधारित दवा खोज और उत्पादन के इस नए दौर में, भारत–EU साझेदारी न केवल व्यापारिक स्थिरता ला सकती है, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभा सकती है.



पिछले सप्ताह वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम में बोलते हुए अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को “अधिग्रहित” करने में अपनी रुचि दोहराई - सैन्य बल से नहीं, बल्कि टैरिफ़ नीतियों के ज़रिए. उन्होंने डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड के समर्थन में खड़े आठ यूरोपीय देशों पर अतिरिक्त टैरिफ़ लगाने की धमकी दी. इससे आर्थिक परस्पर निर्भरता की मजबूती पर सवाल खड़े हो गए.



अमेरिका की दवाओं के लिए वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता और दवाओं की “अनुचित” कीमतों से जुड़े तर्कों को फिर से सामने लाकर, ग्रीनलैंड संकट यह दिखाता है कि किस तरह दवाओं को भू-राजनीतिक दबाव के औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. इससे दवा आपूर्ति श्रृंखलाओं की कमजोरियाँ भी उजागर होती हैं. ऐसे समय में, जब भारत और यूरोपीय संघ ने इस सप्ताह मुक्त व्यापार समझौता (FTA) किया है और टैरिफ़ का खतरा बना हुआ है, फार्मास्यूटिकल क्षेत्र चर्चा के केंद्र में रहेगा. भारत-अमेरिका के बीच दवा व्यापार - जहाँ भारत अमेरिका को जेनेरिक दवाओं का बड़ा आपूर्तिकर्ता है - यह दिखाता है कि टैरिफ़ से स्वास्थ्य सुरक्षा को कितना बड़ा जोखिम हो सकता है.



पिछले वर्ष फार्मास्यूटिकल क्षेत्र में भारी अनिश्चितता रही, जब ट्रंप प्रशासन ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए दवाओं पर टैरिफ़ लगाने की धमकी दी. अप्रैल 2025 में सेक्शन 232 के तहत एक जाँच शुरू की गई, जिसका उद्देश्य यह आकलन करना था कि दवाओं के आयात से राष्ट्रीय सुरक्षा को क्या जोखिम है. इस जांच के नतीजे मार्च में आने की संभावना है.


इसके बावजूद, प्रशासन बार-बार संकेत देता रहा कि वह दवा क्षेत्र पर विशेष टैरिफ़ लगाएगा, ताकि अमेरिका में दवा निर्माण बढ़े और दवाओं की कीमतें कम हों. शुरुआत में 250 प्रतिशत तक टैरिफ़ की बात कही गई, बाद में यह घोषणा हुई कि पेटेंट और ब्रांडेड दवाओं पर 100 प्रतिशत टैरिफ़ लगाया जाएगा, जब तक कि कंपनियाँ अमेरिका में निर्माण इकाइयां न स्थापित करें. अक्टूबर 2025 में यह प्रक्रिया अस्थायी रूप से रोक दी गई, क्योंकि अमेरिका ने अन्य देशों और बड़ी दवा कंपनियों के साथ दवा कीमतें घटाने पर बातचीत शुरू की.



इसके बाद दक्षिण कोरिया, स्विट्ज़रलैंड और जापान जैसे देशों के साथ व्यापार समझौते किए गए, ताकि दवाओं पर शुल्क कम किया जा सके. ब्रिटेन ने अमेरिका के साथ दवाओं पर शून्य-टैरिफ़ समझौता किया, जिसके बदले ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (NHS) को दवाओं के लिए लगभग 25 प्रतिशत अधिक भुगतान करना पड़ा. यह समझौता तब हुआ जब MSD, एस्ट्राज़ेनेका और एली लिली जैसी बड़ी दवा कंपनियों ने ब्रिटेन में निवेश रोक दिया और अमेरिका में विस्तार जारी रखा.



हालाँकि इन समझौतों से कुछ राहत मिली, लेकिन ट्रांस-अटलांटिक दवा व्यापार की गहरी संरचनात्मक कमज़ोरियाँ सामने आ गईं. आयरलैंड के लिए अमेरिका सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार है. अगस्त 2025 में अमेरिका-EU व्यापार समझौते के तहत यूरोपीय संघ से निर्यात होने वाली दवाओं पर 15 प्रतिशत की सीमा तय की गई, जिससे यूरोपीय दवा उद्योग को राहत मिली. लेकिन दावोस में ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड में सैनिक भेजने वाले देशों पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत टैरिफ़ की धमकी ने इस समझौते की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए. इसके जवाब में EU ने “एंटी-कोएरशन इंस्ट्रूमेंट” जैसे कड़े व्यापार उपायों पर विचार किया.



ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप का रुख नया नहीं है. अपने पहले कार्यकाल में भी उन्होंने ऐसा प्रस्ताव रखा था, जिसे डेनमार्क ने ठुकरा दिया था. पिछले वर्ष जब यह मुद्दा फिर उठा, तो नोवो नॉर्डिस्क सहित बड़ी डेनिश कंपनियों के CEO ने सरकार से चर्चा की.


अमेरिका की इंसुलिन और वज़न घटाने वाली दवाओं के लिए नोवो नॉर्डिस्क पर भारी निर्भरता को देखते हुए, आर्थिक दबाव की नई रणनीतियाँ सामने आईं. “मोस्ट-फेवर्ड नेशन” (MFN) नीति के तहत अमेरिका ने कुछ नई दवाओं की कीमतें विकसित देशों में सबसे कम स्तर से जोड़ दीं. इसके परिणामस्वरूप, नवंबर 2025 में अमेरिका और नोवो नॉर्डिस्क के बीच एक समझौता हुआ, जिसके तहत कंपनी को तीन वर्षों के लिए टैरिफ़ से छूट मिली.



नोवो नॉर्डिस्क पर डेनमार्क की अत्यधिक निर्भरता उसकी अर्थव्यवस्था को असुरक्षित बनाती है. कंपनी का मूल्य 2024 में डेनमार्क की GDP से भी अधिक था और उसकी 60 प्रतिशत बिक्री उत्तरी अमेरिका से होती है. यह स्थिति फिनलैंड के नोकिया अनुभव जैसी आर्थिक जोखिमों की याद दिलाती है.


इसी पृष्ठभूमि में, यूरोपीय संसद ने हाल ही में “क्रिटिकल मेडिसिन्स एक्ट” का समर्थन किया, ताकि दवाओं की आपूर्ति को भू-राजनीतिक तनावों से सुरक्षित रखा जा सके. यह कानून चीन और भारत से आने वाले API पर निर्भरता को भी ध्यान में रखता है. भारत, जो EU का एक प्रमुख API आपूर्तिकर्ता है और फार्मा नवाचार में साझा रुचि रखता है, EU के लिए एक अहम रणनीतिक साझेदार बन सकता है.



इस पृष्ठभूमि में भारत–यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुआ नया मुक्त व्यापार समझौता (FTA) केवल एक व्यापारिक समझौता न रहकर एक रणनीतिक ढांचे के रूप में उभर रहा है. परंपरागत रूप से फार्मास्यूटिकल क्षेत्र को दंडात्मक व्यापार उपायों और टैरिफ़ युद्धों से अलग रखा जाता रहा है, क्योंकि इसका सीधा संबंध सार्वजनिक स्वास्थ्य और जीवनरक्षक आवश्यकताओं से होता है. लेकिन पिछले एक वर्ष में वैश्विक स्तर पर हुए घटनाक्रम यह स्पष्ट करते हैं कि अब यह धारणा बदल रही है. दवाओं की आपूर्ति श्रृंखला, कच्चे माल की उपलब्धता और नवाचार आधारित सहयोग तेजी से भू-राजनीतिक और आर्थिक रणनीतियों का हिस्सा बनते जा रहे हैं.


भारत–अमेरिका दवा व्यापार इसका एक अहम उदाहरण है. अमेरिका की स्वास्थ्य प्रणाली में भारत द्वारा आपूर्ति की जाने वाली जेनेरिक दवाओं की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण है कि इन्हें टैरिफ़ से छूट दी गई. यह छूट इस बात को रेखांकित करती है कि किफ़ायती जेनेरिक दवाएँ अमेरिकी स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए अनिवार्य हैं और किसी भी तरह का व्यापारिक अवरोध सीधे जनस्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है.



इसी अनुभव से यह भी स्पष्ट होता है कि भविष्य की व्यापार नीतियाँ केवल आयात-निर्यात तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता, तकनीकी क्षमता और नवाचार साझेदारियों को केंद्र में रखेंगी. ऐसे में भारत–EU FTA दोनों पक्षों के लिए दवा क्षेत्र में दीर्घकालिक सहयोग, जोखिम साझा करने और रणनीतिक संतुलन बनाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है. 


हालाँकि, उच्च-मूल्य वाले दवा नवाचार के क्षेत्र में भारत अभी पीछे है, जबकि यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार में लगातार अधिक रणनीतिक बनता जा रहा है. भारत में कई बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां मौजूद हैं और अब बड़ी संख्या में कंपनियां AI आधारित दवा खोज को अपने काम में शामिल कर रही हैं. एस्ट्राज़ेनेका ने चेन्नई में अपने ग्लोबल इनोवेशन एंड टेक्नोलॉजी सेंटर (GITC) का विस्तार किया है, ताकि इस क्षेत्र में अपनी तकनीकी क्षमताएँ बढ़ा सके. इसी तरह, IIT कानपुर के स्टार्ट-अप इनक्यूबेशन एंड इनोवेशन सेंटर (SIIC) ने बोएरिंगर इंगेलहाइम इंडिया के साथ मिलकर स्वास्थ्य नवाचार को बढ़ावा देने के लिए साझेदारी की है.


इस संदर्भ में, भारत–EU FTA की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है. बीते वर्ष के घटनाक्रम यह स्पष्ट करते हैं कि अब केवल व्यापार ही नहीं, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा और नवाचार आधारित साझेदारियाँ भी नीति-निर्माण के केंद्र में हैं.


इसके अलावा, यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी (EMA) और अमेरिकी फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) ने हाल ही में दवा विकास में AI के उपयोग को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए हैं. ये दिशानिर्देश अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए एक साझा आधार बन सकते हैं. संयुक्त अनुसंधान एवं विकास, नवाचार आधारित संस्थागत साझेदारियाँ, और AI से जुड़े नियमों का सामंजस्य टैरिफ़ से जुड़ी अनिश्चितताओं के बीच स्थिरता प्रदान कर सकता है और ज़रूरी दवाओं की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित कर सकता है.



ग्रीनलैंड से जुड़ा घटनाक्रम यह दिखाता है कि टैरिफ़ को कितनी तेज़ी से भू-राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. बदलती टैरिफ़ नीतियाँ और दवा क्षेत्र में तेज़ तकनीकी बदलाव यह संकेत देते हैं कि व्यापार और औद्योगिक नीति को अलग-अलग खाँचों में देखना अब संभव नहीं है. जैसे-जैसे AI आधारित दवा विकास स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए और अधिक महत्वपूर्ण होता जा रहा है, वैसे-वैसे नियामकों, शोध संस्थानों और उद्योग के बीच मानकों का सामंजस्य भी उतना ही ज़रूरी हो जाएगा जितना टैरिफ़ का सवाल. संयुक्त अनुसंधान, एक-दूसरे से जुड़ी नियामक प्रक्रियाएँ और साझा नवाचार मंचों पर आधारित एक मज़बूत भारत–EU दवा साझेदारी, अनिश्चितताओं से निपटने और आवश्यक दवाओं तक पहुँच को मजबूत करने का एक टिकाऊ रास्ता प्रदान करती है.



लक्ष्मी रामकृष्णन ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में एसोसिएट फेलो हैं.

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