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केंद्र की श्रम नीतियों के खिलाफ जमशेदपुर में चक्का जाम, बैंक और बीमा सेवाएं पूरी तरह ठप

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जमशेदपुर में चक्का जाम



जागरण संवाददाता, जमशेदपुर। केंद्र सरकार के चार नए श्रम कानून के विरोध में संयुक्त ट्रेड यूनियन ने गुरुवार को एक दिवसीय राष्ट्रव्यापी हड़ताल की घोषणा की है इसमें जमशेदपुर के सभी बैंक व बीमा सेक्टर में कामकाज पूरी तरह से ठप है।

इस हड़ताल से भारतीय जीवन बीमा निगम व उसकी सभी इकाई अपना नैतिक समर्थन दे रही है लेकिन संयुक्त ट्रेड यूनियन के कार्यकर्ता गुरुवार सुबह 10 बजे से बिष्टुपुर स्थित मुख्य शाखा के मेन गेट को जाम कर दिया है और किसी भी कर्मचारी व ग्राहक को अंदर जाने नहीं दिया जा रहा है।
राष्ट्र विरोधी नीतियों के खिलाफ लगातार आंदोलन

झारखंड सीटू के महासचिव विश्वजीत देव का कहना है कि विगत वर्षों में ट्रेड यूनियनें, केंद्र सरकार की श्रमिक-विरोधी किसान विरोधी और राष्ट्र विरोधी नीतियों के खिलाफ लगातार आंदोलन की राह पर रही हैं।

9 जुलाई-2025 को मजदूरों के अधिकार छीनने वाले लेबर कोड के खिलाफ और जनपक्षीय वैकल्पिक नीति व व्यवस्था से जूड़ी मांगों को लेकर 25 करोड़ मजदूरों की ऐतिहासिक देशव्यापी हड़ताल को किसानों की एकजुटता के साथ प्रभावित जनता का अभूतपूर्व समर्थन मिला जिसके कारण केंद्र सरकार ने इन कानूनों को अब तक क्रियान्वित नहीं कर पाई है।
12 फरवरी 2026 को एक दिवसीय राष्ट्रीय हड़ताल

लेकिन लगातार विरोध के बावजूद केंद्र सरकार, कॉर्पोरेट निर्देशित नीतियों को लागू करते हुए मुट्ठी भर कारपोरेट कंपनियों की तुष्टिकरण की कीमत पर बहुसंख्यक जनता का बर्बर शोषण करने पर अड़ी हुई है।

इसलिए खराब होती अर्थव्यवस्था, बढ़ती बेरोजगारी, बढ़ते सामाजिक तनाव, लोकतांत्रिक अधिकारों तथा वोट के अधिकारों पर बढ़ते हमले की पृष्ठभूमि मेंके विरोध 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों, स्वतंत्र फेडरेशनों और एसोसिएशनों के संयुक्त मंच ने 12 फरवरी 2026 को एक दिवसीय राष्ट्रीय हड़ताल की घोषणा की है।

विश्वजीत देव का कहना है कि केंद्र सरकार ने ट्रेड यूनियनों से परामर्श किए बिना और भारतीय श्रम सम्मेलन (आइएलसी) बुलाए बिना, अलोकतांत्रिक तरीके से 4 लेबर कोड और उनके नियम बनाए गए हैं. जिसका मुख्य उद्देश्य है- ट्रेड यूनियनों को कमजोर करना और मजदूर आंदोलन को, पूंजी के हमले के सामने निहत्थे बना देना।
70 प्रतिशत कारखानों को श्रम कानूनों के दायरे से बाहर

ये श्रम संहिताएं हड़ताल के अधिकार को छीनने, लगभग 70 प्रतिशत कारखानों को श्रम कानूनों के दायरे से बाहर करने और श्रमिकों को नियोक्ताओं के खिलाफ लंबी लड़ाई के बाद मिलने अधिकारिायें को छोड़ने के लिए बनाई गई हैं।

यह मजदूरी की परिभाषा बदलने, यूनियनों को बनाना असंभव करने और श्रमिकों पर गुलामी की पार्टी थोपने की एक सोची-समझी साजिश है, ताकि कॉर्पोरेट घरानों की लूट बढ़ाई आ सके।
खत्म हो जाएगी ट्रेड यूनियन की अवधारणा

कोल्हान एटक के नेता हीरा अरकने का कहना है कि सरकार ने जो नई “श्रम शक्ति नीति-2025“ का ड्राफ्ट जारी किया है। इसका मकसद ट्रेड यूनियनों की अवधारणा को ही खत्म करना है। इसमें मेहनत की एक “अधिकार के बजाय “धर्म बताया गया है। अब सरकार कानून लागू करने के बजाय सिर्फ पूंजी को “सुविधा देने वाली संस्था बनकर रह जाएगी।

यह मसौदा, सामूहिक सौदेबाजी और त्रिपक्षीय संवाद को नकारता है और राज्य सरकारों की भूमिका को कम करता है। स्वतंत्रता, समानता और मौलिक अधिकारों जैसे संवैधानिक मूल्यों की अवहेलना करते हुए, यह नीति प्राचीन ग्रंथों से प्रेरणा लेने का दावा करती है।
सरकार नहीं भर रही है रिक्त पदें

संयुक्त ट्रेड यूनियन के नेता ओम प्रकाश का कहना है कि देश में 65 लाख सरकारी पद रिक्त हैं जिसे सरकार नहीं भर रही है। इसके बावजूद सरकार सरकारी संस्थानों में भी स्थायी प्रकृति के कामों के लिए योजनाबद्ध तरीके से ठेका प्रथा में बदलने, अस्थायी, आउटसोर्स और प्रशिक्षु श्रमिकों को प्रतिस्थापित कर रही है।

वहीं सरकाररेलवे, बंदरगाह, डाक, कोयला खदानें, तेल, स्टील, रक्षा, रोडवेज, हवाई अड्डे, बैंक, बीमा, दूरसंचार, परमाणु ऊर्जा, बिजली उत्पादन और आपूर्ति आदि सेक्टर का तेजी से निजीकरण कर रही है। सरकार एचईसी लिमिटेड जैसी संस्था को बंद करने की साजिशों के तहत देश की आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था को खतरे में डाल रही है।

इसके कारण आवश्यक वस्तुऐं, शिक्षा और इलाज अब आम आदमी की पहुंच से बाहर हो रही हैं। असमानताएं बढ़ने के साथ, बहुत बड़ी संख्या में लोग गरीबी रेखा से नीचे के जीवन स्तर की ओर धकेले जा रहे हैं।

किसानों के ऐतिहासिक आंदोलन के सामने मजबूर होकर सरकार को तीन कृषि कानून को वापस लेना पड़ा था। इसके बावजूद, केंद्र सरकार नए कानून लाकर खेती और कृषि उत्पादों की मार्केटिंग को बड़े बिजनेस घरानों के हवाले करने पर तुली हुई है।
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