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विश्व रेडियो दिवस: डिजिटल युग में भी रेडियो की विश्वसनीयता और पहुंच का जादू, सशक्त संचार का माध्यम

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विश्व रेडियो दिवस



जागरण संवाददाता, पटना। रेडियो केवल सूचना या मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि समय का साक्षी और समाज की सामूहिक स्मृति है। इंटरनेट युग में आज भी यह माध्यम अकेलेपन का साथी बनता है। आपदा में मार्गदर्शक और लोकतंत्र में जन की आवाज है। डिजिटल युग में भी रेडियो अपनी विश्वसनीयता और पहुंच के कारण जनसंचार का सशक्त माध्यम बना हुआ है।

कम लागत, त्वरित प्रसारण और व्यापक प्रभाव के कारण रेडियो ने सूचना, शिक्षा और आपदा प्रबंधन में अहम भूमिका निभाई है। रेडियो ने चेतना और संवाद का सेतु बनकर समाज को दिशा दी है। हर साल 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाया जाता है। किसी जमाने में रेडियो रखना लोगों की पहचान थी।

बदलते समय के साथ डिजिटल युग में स्मार्ट टीवी, फोन, कंप्यूटर के बावजूद यह माध्यम जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता को बरकरार रखा है। वर्तमान समय में प्रधानमंत्री भी मन की बात के लिए रेडियो का चुनाव करते हैं।

आज भी रेडियो की सुरीली आवाज लोगों को सुकून देती है। पटना आकाशवाणी केंद्र के अलावा अब शहर में कई निजी रेडियो केंद्र खुले हैं। जो श्रोताओं को दिन-रात मनोरंजन करा रहे हैं। 26 जनवरी 1948 को आकाशवाणी पटना केंद्र का उद्घाटन हुआ था।

वहीं दो अक्टूबर 1975 को विविध भारती का प्रसारण आरंभ हुआ। दो अक्टूबर 1993 से सप्ताह में तीन बार मैथिली भाषियों के लिए कार्यक्रम आरंभ हो जो अनवरत जारी है। आज https://www. newsonair.gov.in/ के जरिए विभिन्न भाषाओं में श्रोता सूचना प्राप्त कर सकते हैं। मोबाइल एप के जरिए रेडियो का आनंद श्रीता उठा रहे हैं।

प्रदेश में आकाशवाणी के चार अलग-अलग केंद्रों से प्रसारण नियमित हो रहा है। आकाशवाणी पटना के कार्यक्रम प्रमुख अंशुमान झा ने बताया कि पटना के अलावा दरभंगा, भागलपुर, पूर्णिया और भागलपुर से रेडियो का प्रसारण होने के साथ प्रदेश के अधिक से अधिक श्रोता रेडियो से जुड़े हैं। पुराने कार्यक्रमों में युवा वाणी, चौपाल समेत अन्य कार्यक्रम जारी हैं।


6 पटना में अकाशवाणी प्रादेशिक समाचार बुलेटिन का प्रसारण 28 दिसंबर 1959 को शुरू हुआ। रेडियो के डिजिटल होने से इसका दायरा और बढ़ गया है। प्रसार भारती के पोर्टल पर देश भर के कार्यक्रम और वेब के जरिए पुराने कार्यक्रमों को सुन सकते हैं। -संजय कुमार, उप निदेशक, प्रसार भारती




पुराने दिनों में रंगकर्मी रामेश्वर सिंह कश्यप के नाटक लोहा सिंह के नाम से काफी मशहूर हुआ करता था। कार्यक्रम शुरू होने से पहले लोग एक जगह जुट जाते थे। तकनीक युग में रेडियो प्रसारण के स्वरूप में बदलाव आया है। रेडियो का अस्तित्व हमेशा रहेगा। -बद्री प्रसाद यादव, पूर्व उ‌द्घोषक, आकाशवाणी पटना




बदलते वक्त के साथ लोग डिजिटल प्लेटफार्म से जुड़ने लगे हैं। लोगों की पसंद को देखते हुए रेडियो भी डिजिटाइज हो गया है। पहले रेडियो में एक तरफा संवाद होता था अब इससे लोग खुलकर अपनी बात रखते हैं। इससे और भी जुड़ाव बढ़ता है। -बरखा, आरजे, रेडियो सिटी
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