Chikheang Publish time 2026-2-14 15:56:26

श्रद्धालु के कदम से हिमालय की आत्मा घायल, उम्मीद बना हीलिंग हिमालय फाउंडेशन; घाव पर लगा रहे मरहम

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हिमालय के घाव पर मरहम लगा रहे हीलिंग हिमालय फाउंडेशन। फोटो जागरण



हंसराज सैनी, मंडी। हिमालय बोलता नहीं, पर बहुत कुछ सहता है। लाखों श्रद्धालु उसके आंचल में कदम रखते हैं और लौट जाते हैं। पीछे रह जाता है कचरे का बोझ। और घायल होता हिमालय का आत्मा। जब कोई इस मौन पीड़ा को समझकर आगे बढ़ता है, तो यह प्रयास केवल स्वच्छता अभियान नहीं, बल्कि संवेदनशीलता की मिसाल बन जाता है।

यह कहानी है हीलिंग हिमालय फाउंडेशन की। फाउंडेशन की नींव लगभग 10 वर्ष पहले प्रदीप सांगवान ने रखी थी। मिलिट्री स्कूल अजमेर के पूर्व छात्र, पंजाब विश्वविद्यालय से मानविकी में स्नातक और मुंबई से इवेंट मैनेजमेंट में पोस्ट ग्रेजुएशन करने वाले सांगवान 10 वर्ष पहले जब हिमालय पहुंचे थे तो वहां की सुंदरता के साथ-साथ उसकी पीड़ा भी देखी।

मानवीय लापरवाही ने यहां गहरी चोटें दी थीं। खाली बोतलों के साथ प्लास्टिक के उत्पाद इस पीड़ा को बढ़ा रहे थे। इससे संबंधित जगह-जगह बिखरा कचरा, पिघलती बर्फ और कराहती प्रकृति ने उन्हें झकझोर दिया। उसी क्षण तय किया था कि हिमालय को केवल देखा नहीं जाएगा, बल्कि उसकी सेवा की जाएगी। फाउंडेशन ने गतिविधियों को किसी एक तीर्थ या परियोजना तक सीमित नहीं रखा।

हिमाचल प्रदेश के लाहुल स्पीति के कोकसर की ठंडी हवाओं से लेकर किन्नौर की ऊंची ढलानों और ताबो की वीरान घाटियों तक हिमालय का दर्द महसूस किया। चंद्रताल झील, युला कांडा, हाम्पटा पास, श्रीखंड महादेव, किन्नौर कैलास, खीरगंगा, श्री मणिमहेश यात्रा मार्ग और बारालाचा पास यह केवल स्थल नहीं, बल्कि वे स्थान हैं, जहां स्वयंसेवकों ने हाथों से हिमालय का बोझ उठाया। संस्था 10 वर्ष में हिमालय से लगभग 2000 टन कचरा एकत्र कर चुकी है।

अब उत्तराखंड के श्री केदारनाथ धाम में लगभग 3583 मीटर की ऊंचाई पर स्थापित मैटीरियल रिकवरी फैसिलिटी संयंत्र इस संकल्प की नई पहचान बन रहा है। आनंदना-द कोका-कोला इंडिया फाउंडेशन के सहयोग से गैर जैविक कचरे का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन किया जा रहा है।

कचरा नदियों में बहकर हिमालय को और घायल नहीं कर सकेगा। मेरा केदार, स्वच्छ केदार जैसे अभियानों ने श्रद्धालुओं को समझाया कि पूजा केवल फूल चढ़ाने से नहीं, बल्कि धरती का ध्यान रखने से भी होती है। हिमालय खुद को बचा नहीं सकता, लेकिन जब इंसान संवेदनशील बनता है, तो उम्मीद जन्म लेती है कि हिमालय फिर मुस्कराएगा और उसकी गोद में शिव का नाम यूं ही रमता रहेगा।
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