झूठी शिकायतों पर रोक के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका, थानों में डिस्प्ले बोर्ड लगाने की मांग
https://www.jagranimages.com/images/2026/02/14/article/image/supreme-court-display-board-1771069556718_m.webpनेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का दिया गया हवाला
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर केंद्र और राज्य सरकारों को यह निर्देश देने की मांग की गई है कि सभी थानों, अदालतों और सार्वजनिक कार्यालयों में \“डिस्प्ले बोर्ड\“ लगाए जाएं। इन बोर्डों पर झूठी शिकायत दर्ज करने, गलत आरोप लगाने और मनगढ़ंत सबूत पेश करने पर मिलने वाली सजा का स्पष्ट विवरण होना चाहिए।
एडवोकेट अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर इस याचिका में तर्क दिया गया है कि निर्दोष नागरिकों के खिलाफ झूठी शिकायतें जीवन के अधिकार, स्वतंत्रता और गरिमा (संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत अधिकार) के लिए गंभीर खतरा हैं। संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा व कानूनी प्रविधान याचिका में कहा गया है कि भारतीय न्याय संहिता 2023 के चौदहवें चैप्टर में इस तरह के अपराधों से निपटने के लिए विशिष्ट प्रविधान हैं, लेकिन सरकार ने इन्हें प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए उचित कदम नहीं उठाए हैं।
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि थानों, तहसील, जिला अदालतों, पंचायत भवनों और शैक्षणिक संस्थानों में सजा के प्रविधानों वाले बोर्ड लगाए जाएं। एफआइआर दर्ज करने से पहले शिकायतकर्ता को झूठी शिकायत के कानूनी परिणामों के बारे में अनिवार्य रूप से सूचित किया जाए। प्रत्येक शिकायतकर्ता से एक शपथ पत्र या वचनबद्धता ली जाए कि उनके द्वारा दी गई जानकारी पूरी तरह सत्य है।
दर्ज मामलों और दोषसिद्धि की दर में भारी अंतर याचिका में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि दर्ज मामलों और दोषसिद्धि की दर में भारी अंतर है। बड़ी संख्या में होने वाली नियुक्तियां यह दर्शाती हैं कि हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली झूठे मुकदमों और मनगढ़ंत सबूतों के कारण बोझ तले दबी हुई है। झूठी शिकायतें और दुर्भावनापूर्ण अभियोजन आपराधिक प्रक्रिया को ही सजा में बदल देते हैं, जिससे व्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक प्रतिष्ठा और मानसिक स्वास्थ्य को अपूरणीय क्षति होती है।
विधि आयोग की 277वीं रिपोर्ट का संदर्भ देते हुए याचिका में कहा गया है कि मौजूदा उपाय \“अनिश्चित और अप्रभावी\“ हैं। इससे न केवल अदालतों का समय बर्बाद होता है, बल्कि बोलने की स्वतंत्रता, व्यापार करने और पेशे को जारी रखने के अधिकार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
(न्यूज एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
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