देहरादून में एएमआर जागरूकता: एंटीबायोटिक्स के गलत उपयोग से बढ़ रहा खतरा
https://www.jagranimages.com/images/2026/02/17/article/image/Antibiotics-Awareness-11-Feb-1771336993573_m.webpदैनिक जागरण के अभियान एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) के तहत कौलागढ़ रोड स्थित ओएनजीसी परिसर, शोभना वाही भवन हॉल में \“ओएनजीसी ऑफिसर्स वाइव्स एसोसिएशन\“ की सदस्यों के लिए कार्यशाला आयोजित की गई। जागरण
जागरण संवाददाता, देहरादून। स्वस्थ समाज के लिए \“दैनिक जागरण\“ के अभियान एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) की गंभीरता को जन-जन तक पहुंचाने के लिए स्वयंसिद्धा एक्स ओएनजीसी आफिसर्स वाइव्स एसोसिएशन के सहयोग से जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया।
चारधाम हास्पिटल की एमडी (मेडिसिन) डा. सुकृति जोशी ने कहा कि एंटीबायोटिक्स का असर कम होने का मुख्य कारण एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) है।
उन्होंने कहा कि जहां बैक्टीरिया दवा के प्रति प्रतिरोधी बन जाते हैं, लेकिन अति प्रयोग, गलत खुराक अथवा कोर्स अधूरा छोड़ने के कारण एएमआर होता है। इससे सामान्य संक्रमण का इलाज मुश्किल हो जाता है और गंभीर बीमारियां बढ़ने लगती हैं।
ओएनजीसी परिसर स्थित शोभना वाही भवन में आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में एसोसिएशन से जुड़ी महिलाएं शामिल हुईं।
डा. सुकृति जोशी ने कहा कि एएमआर तब होता है, जब संक्रमण पैदा करने वाले जीवाणु जैसे रोगाणु दवाओं के असर को रोकने की क्षमता विकसित कर लेते हैं और उपचारों पर प्रतिक्रिया देना बंद कर देते हैं। इससे आम संक्रमण और चोट, जिनका पहले आसानी से इलाज हो जाता था, अब अधिक खतरनाक होती जा रही हैं।
कहा कि बीमारी अब रेजिस्टेंस हो गई हैं। पहले जो इंफेक्शन तीन से पांच दिनों में ठीक हो जाते थे, अब उन्हें 15 दिनों तक की एंटीबायोटिक्स देनी पड़ती हैं। भारत डायबीटीज के साथ ही इंफेक्शन के मामले में टाप पर हैं।
एक समय ऐसा था, जब ब्लैक प्लेग व बांबे प्लेग ने आधी जनसंख्या खत्म कर दी। टीबी भी 19वीं सदी से प्रभावित करने लगा। पहले बड़ी बीमारी फैलने पर इलाज न होने के कारण लोग गांव छोड़कर चले जाते थे।
इसके बाद दवा बनी तो 20वीं सदी से मौत के मामलों में कमी आई। एंटीबायोटिक्स से हमें काफी मदद मिली। सबकुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन इस बीच लोगों ने बिना डाक्टर की सलाह और ओवर द काउंटर दवा लेना शुरू किया।
कृषि में भी इनका अधिक उपयोग शुरू हो गया। जिसने मनुष्य के भीतर के बैक्टीरिया खत्म होने लगे और इसने अपना प्रभाव जमा दिया।
उन्होंने कहा कि जो एंटीबायोटिक एक बैक्टीरिया को मारने के लिए उपयोग की जाती है, लेकिन जब उसका गलत तरीके से उपयोग होने से शरीर के सभी बैक्टीरिया को मार देती है। जिसके बाद कोई भी एंटीबायोटिक असर नहीं करती।
एंटीबायोटिक्स कर चुके खत्म, ढूंढ़ने में लगते हैं कई वर्ष
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लोग हल्की खांसी, जुकाम में बिना किसी से पूछे सीधा एंटीबायोटिक खा लेते हैं। जबकि इसका कोई काम नहीं है। 100 वर्ष से भी कम समय में हम अपनी एंटीबायोटिक्स खत्म कर चुके हैं। जबकि एक एंटीबायोटिक ढूंढ़ने में कई वर्ष लग जाते हैं। यह सिर्फ डाक्टरों की समस्या नहीं, बल्कि समाज के लिए चिंता का विषय है।
-डा. सुकृति जोशी
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स्वास्थ्य जागरूकता अभियान \“सही दवा, पूरी दवा\“ के जरिये एंटीबायोटिक दवाओं के विवेकपूर्ण उपयोग पर यह कार्यक्रम ज्ञानवर्धक रहा। डा सुकृति ने जिस सरलता से एंटीबायोटिक दवा में लापरवाही न करने और डाक्टर की सलाह की अनिवार्यता को समझाया, वह हमारे समाज को स्वस्थ दिशा देगा।
- मंजु चौधरी अध्यक्ष, स्वयंसिद्धा एक्स ओएनजीसी आफिसर्स वाइव्स एसोसिएशन।
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स्वस्थ समाज के लिए केवल दवा लेना ही नहीं, बल्कि दवा की सही जानकारी होना भी आवश्यक है। एंटीबायोटिक दवाओं का अधूरा कोर्स सुपरबग के खतरे को बढ़ाता है, इसलिए जागरूक रहें और सुरक्षित रहें। सजगता ही बचाव का सबसे बड़ा हथियार है।
- अंजु रावत, उपाध्यक्ष, स्वयंसिद्धा एक्स ओएनजीसी आफिसर्स वाइव्स एसोसिएशन।्र
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डाक्टर की पर्ची के बिना एंटीबायोटिक लेना स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। डा. सुकृति ने जो जानकारी दी, वह हम सभी के परिवार और बच्चों की सुरक्षा के लिए बेहद अहम हैं। \“सही दवा, पूरी दवा\“ का संदेश जन-जन तक पहुंचाना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।
- स्वीटी कलेर, सचिव, स्वयंसिद्धा एक्स ओएनजीसी आफिसर्स वाइव्स एसोसिएशन।
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